सोमवार, 13 फ़रवरी 2017

हर ओर तुम्हारी चर्चा

हर ओर तुम्हारी चर्चा
हर और तुम्हारी बातें
तेरी सोच में बीत रहे थे दिन
कट सी रही थी रातें
तेरे भोलेपन की हम मिशाल दिया करते थे
पर न जाने अब क्यों सूख रही हैं सांसे
हर ओर तुम्हारी चर्चा
हर और तुम्हारी बातें ॥

हमने जो भी गाए हैं
गज़लें, गीत, अफ़साने
छोड़ उन्हें अब, न सुन उनको
यूं ही रोते रहे कवि है
यूं ही गाते रहे दीवाने
हम चांद की चंचलता न समझे
यहां कहां है कोई अपना
जाने मन क्यों तुम्हें अपना माने ॥

हम दिल के दर्द से दुखी बहुत हैं
पर दर्द भला यह किस से बांटें
क्या क्या कहते हैं लोग यहां
हम किस किस को रोकें
और किस किस को डांटें ॥

तुम हंस कर काट रही हो वक़्त यहां
समझ न आए हम कैसे काटें
हर ओर तुम्हारी चर्चा
हर और तुम्हारी बातें ॥

सुशील कुमार पटियाल
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Bye bye dear

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