रविवार, 5 फ़रवरी 2017

हूँ बेहोश मैं

तुम बस गई हो मेरी सोच में
दिखता हूं होश में मगर
अक्सर रहता हूँ बेहोश मैं
चलते-चलते थम से जाते हैं कदम
खुशियां मिलती नहीं, ठहर जाते हैं गम
छलक न जाएं आंखें अब ये
भर लो अपनी आगोश में
तुम बस गई हो मेरी सोच में
दिखता हूं होश में मगर
अक्सर रहता हूँ बेहोश में ॥
कभी दम भरते हैं कि कह दें, बात दिल की तुम से
मगर जब आती हो सामने, होश हो जाते हैं गुम से
जब दिल की बातें दिल में ही रह जाती हैं
नज़रें तुम पे और बस तुम पे ठहर जाती हैं
जव चलो जाती हो बिन बात किए
जाने रहती है क्यों तुम रोष में
तुम बस गई हो मेरी सोच में
दिखता हूं होश में मगर
अक्सर रहता हूँ बेहोश में ॥

© Copyright सुशील कुमार पटियाल
05-02-2017  7:23 pm
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Bye bye dear

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