बुधवार, 19 अप्रैल 2017

खुद की पहचान

तुम खुद ही खुद के शत्रु हो
और खुद ही खुद के साथी हो
जब बात समझ ये आ जाती है
तब दुनिया सारी भा जाती है ॥

फिर अपना किसी को नहीं कहते हो
और कोई पराया नहीं लगता है
जब जनमानस सोता रहता है
तब अंत्रमन तेरा जगता है ॥

जब अपना पराया भूल जाते हो
जब खुद को ही तुम धूल पाते हो
तब भेदभाव सब भूल जाता है
तब न कोई शत्रु होता है
न साथी कोई रह जाता है ॥

सुशील कुमार पटियाल
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दिनांक: 16-04-2017

बुधवार, 22 फ़रवरी 2017

उजाले ढूंढते हैं

रातों को जग-जग कर
दिन के उजाले ढूंढते हैं
खुद को खोज नहीं पाते
सब मारे-मारे घूमते हैं
रातों को जग-जग कर
दिन के उजाले ढूंढते हैं।।

जब तक है जवानी, जंग जारी है
जिंदगी की यह दूसरी पारी है
जाने कब खेल खत्म हो जाना है
पर लगता है जैसे जिंदगी अभी सारी है।।

नियम नियति के तोड़कर
बनावटी पुष्पों से सुगंध सूंघते हैं
रातों को जग-जग कर
दिन के उजाले ढूंढते हैं ।।

सुशील कुमार पटियाल
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शुक्रवार, 17 फ़रवरी 2017

सारे सहारे खो जायेंगे

एक दिन आंखों से उजाले ओझल हो जाएंगे
जिनको जीवन भर चाहा, वो सारे सहारे खो जायेंगे
हाथ तेरे न फिर कुछ भी होगा, सबसे किनारे हो जाएंगे
कहां रहा कोई साथ सदा, सब खुदा के प्यारे हो जाएंगे ॥

नफरत से न नाता जोड़ो, ये फूल अंगारे हो जाएंगे
प्रेम बिना यहां पल भी भारी, बिन प्रेम नकारे हो जाएंगे
तेरे आंसू की यहां कीमत क्या है, केवल दर्द तुम्हारे हो जाएंगे
प्रेम की भाषा पंछी भी जानें, इक दिन सपनों में सब खो जाएंगे ॥

खोज खबर अब खुद की भी ले ले, सदा नहीं जीवन के मेले
खोजोगे जो खुद के भीतर, उस दिन अंदर उजाले हो जाएंगे
खाली रहेगा पड़ा जिस्म ये, उस दिन लोगों के अंदाज निराले हो जाएंगे
ख़बर तेरी फिर किसको होगी, सब खास तुम्हारे खो जाएंगे ॥

एक दिन आंखों से उजाले ओझल हो जाएंगे
जिनको जीवन भर चाहा, वो सारे सहारे खो जायेंगे ॥

सुशील कुमार पटियाल

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सोमवार, 13 फ़रवरी 2017

हर ओर तुम्हारी चर्चा

हर ओर तुम्हारी चर्चा
हर और तुम्हारी बातें
तेरी सोच में बीत रहे थे दिन
कट सी रही थी रातें
तेरे भोलेपन की हम मिशाल दिया करते थे
पर न जाने अब क्यों सूख रही हैं सांसे
हर ओर तुम्हारी चर्चा
हर और तुम्हारी बातें ॥

हमने जो भी गाए हैं
गज़लें, गीत, अफ़साने
छोड़ उन्हें अब, न सुन उनको
यूं ही रोते रहे कवि है
यूं ही गाते रहे दीवाने
हम चांद की चंचलता न समझे
यहां कहां है कोई अपना
जाने मन क्यों तुम्हें अपना माने ॥

हम दिल के दर्द से दुखी बहुत हैं
पर दर्द भला यह किस से बांटें
क्या क्या कहते हैं लोग यहां
हम किस किस को रोकें
और किस किस को डांटें ॥

तुम हंस कर काट रही हो वक़्त यहां
समझ न आए हम कैसे काटें
हर ओर तुम्हारी चर्चा
हर और तुम्हारी बातें ॥

सुशील कुमार पटियाल
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मन को बलवान करो

तन की ताकत को न तोलो
पहले मन को बलवान करो
तन की ताकत पे तन न इतना
इतना न अभिमान करो ॥

ताकत तरु के पास बहुत है
तुम हो गौण वह ख़ास बहुत है
तुम तो खुद से ही दूर बहुत हो
वो बोले न पर ख़ास बहुत है ॥

समय साधता है हम सबको
कभी करो बुरा न, उस रब से डरो
वक्त से बड़ा बलवान न कोई
तो आओ सबका सम्मान करो

तन की ताकत को न तोलो
पहले मन को बलवान करो ॥

सुशील कुमार पटियाल
© Copyright

न चिन्ता हो

न भूत की चिन्ता
न भविष्य की चिन्ता
न चिन्ता हो वर्तमान की
सब कुछ तुम ही तो करते हो कृष्ण
बस ध्यान रहे यह बात ज्ञान की
न भूत की चिन्ता
न भविष्य की चिन्ता
न चिन्ता हो वर्तमान की ॥

इन अंखियों में बस तुम बस जाओ
इस धोखे वाली दुनिया से
अपना यह नाता तोड़ दिया
अब तुम ही एक सहारा हो
अब तुम ही मेरे प्यारे हो
तुम से ही प्रीत बंद हे मेरी
दूर रहे हर बात अज्ञान की
न भूत की चिन्ता
न भविष्य की चिन्ता
न चिन्ता हो वर्तमान की ॥

सुशील कुमार पटियाल
© Copyright

शुक्रवार, 10 फ़रवरी 2017

तख्त बदल गए

तख्त बदल गए, ताज बदल गए
जीने के अंदाज़ बदल गए
सुर तो अब भी सात हैं लेकिन
बस गाने के अंदाज़ बदल गए ॥

सुशील कुमार पटियाल © कॉपीराइट

रविवार, 5 फ़रवरी 2017

हूँ बेहोश मैं

तुम बस गई हो मेरी सोच में
दिखता हूं होश में मगर
अक्सर रहता हूँ बेहोश मैं
चलते-चलते थम से जाते हैं कदम
खुशियां मिलती नहीं, ठहर जाते हैं गम
छलक न जाएं आंखें अब ये
भर लो अपनी आगोश में
तुम बस गई हो मेरी सोच में
दिखता हूं होश में मगर
अक्सर रहता हूँ बेहोश में ॥
कभी दम भरते हैं कि कह दें, बात दिल की तुम से
मगर जब आती हो सामने, होश हो जाते हैं गुम से
जब दिल की बातें दिल में ही रह जाती हैं
नज़रें तुम पे और बस तुम पे ठहर जाती हैं
जव चलो जाती हो बिन बात किए
जाने रहती है क्यों तुम रोष में
तुम बस गई हो मेरी सोच में
दिखता हूं होश में मगर
अक्सर रहता हूँ बेहोश में ॥

© Copyright सुशील कुमार पटियाल
05-02-2017  7:23 pm

शनिवार, 4 फ़रवरी 2017

जिए जा रहे हैं

बस जिए जा रहे हैं
क्या खोया और क्या पाया है
ये हिसाब किए जा रहे हैं
रोज एक दिन आता है
एक रात चली जाती है
दिए बुझते हैं, बाती सुलग जाती है
खुद से खुद ही खफा रहने लगे हैं
थोड़ा सेहत का भी करो
लोग यह हम से कहने लगे हैं
हर बार जख्म गहरे जाते हैं
पर सिलने की, नाकाम सी कोशिश किए जा रहे हैं
बस जिए जा रहे हैं
क्या खोया और क्या पाया है
ये हिसाब किए जा रहे हैं ॥

धन हो पास तुम्हारे
तो मित्र कई मिल जाते हैं
बन जाते हैं कई सहारे
मगर हम तो वह भी पा न पाए
दिल के तराने कहां किसको सुनाएं
सब तो अपने मन की किए जा रहे हैं
जिंदगी जैसे ज़हर बन गई
और वही जहर पीए जा रहे हैं
बस जिए जा रहे हैं
क्या खोया और क्या पाया है
ये हिसाब किए जा रहे हैं ... ॥

सुशील कुमार पटियाल
© Copyright
O4-02-2017  O7:.21 PM

गुरुवार, 2 फ़रवरी 2017

कैसा झगड़ा कैसी लड़ाई

कितने साल चले गए
लटक गई खाल बाल चले गए ॥
आंखें भी अब जवाब दे गईं
बीते दिनों के ख्वाब दे गईं ॥
कान कहां अब सुनते हैं
अब मन की बातें बुनते हैं ॥
फिर भी अभिमान नहीं जाता
नया चेहरा पाने की कोशिश करता
खुद को नया - नया दिखलता ॥
सच को साकार करो ऐ भाई
न शेखी बघारो न करो बढ़ाई
सब जाना है सब छोड़ छाड़ के
फिर कैसा झगड़ा, कैसी लड़ाई ॥

सुशील कुमार पटियाल
© copyright

बुधवार, 1 फ़रवरी 2017

जीवन के दिन चार

प्यार में गुजार दे, ये जीवन के दिन चार है
प्रेम नहीं यह जानता कहां कोठी बंगला कार है
सब कुछ सहता है वह इंसान
जिसके सर पर प्यार सवार है
प्यार में गुजार दे कि जीवन के दिन चार है ॥

रोष में न कभी होश रहता है
यह पागल कवि, वो दीवाना कहता है
रूठ के रहना, न कुछ भी कहना
बिन तेरे, मेरा नीरस ये संसार है
प्यार में गुजार दे, ये जीवन के दिन चार है ॥

सदा के लिए नहीं हैं सांसें
वक्त कहां किस किस को जांचे हैं
यह जीवन भी तो नहीं है अपना
यह सांसें भी तो उधार हैं
प्यार में गुजार दे, ये जीवन के दिन चार है ॥

 Sushil Kumar Patial
© Copyright
31-01-2017
5:00 AM

रविवार, 8 जनवरी 2017

पल-पल पाप कमाता है

कल का पता नहीं है पगले
क्यों पल-पल पाप कमाता है
पल पल तेरा पतन हो रहा
क्यों ना कोई तुझे समझाता है ॥

सत्य रहेगा सदा सनातन
रुह है अपनी अमर पुरातन
देह यहीं पे दान किए जा
न संग चलेगा तन और धन ॥

संग लाया था क्या -
जो खोने का डर सताता है
जैसा बीज बीजता धरा में
फल वैसा ही पता है ॥

पाप का बोझ बढ़ाने में
कुछ तेरा भी हिस्सा है
तू अकेला नहीं जगत में
ये तो हर इंसान का किस्सा है॥

माना तू बलवान बहुत है
पर क्यों बलहीन को सताता है
पापों की ये पोटली लेकर
क्यों पापी कहलाता है ॥

कल का पता नहीं है पगले
क्यों पल-पल पाप कमाता है ॥

© Copyright
सुशील कुमार पटियाल
दिनांक: 01-08-2016
समय: 07:07 AM


Thanks for loving me

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Bye bye dear

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