शुक्रवार, 31 जुलाई 2015

इन्सान ये सोच रहा...

तेरी देह पर तेरा अधिकार नहीं
फिर करता क्यों ये विचार नहीं
दोष दूसरों के दिख जायें
पर क्यों अपनों पे ये विचार नहीं।।

हर एक इन्सान ये सोच रहा
कि बस वही महान है
मगर शायद नहीं वो जानता
कि यही सब से बडा अग्यान है ।।

घमण्ड के कारण घमासान है
जहां प्रेम वहां सब आसान है
फिर क्यों नही प्रेम अपनाते हैं
सब क्यों परायेपन से सब परेशान हैं

सुशील कुमार पटियाल

३०-०७-२०१५

गुरुवार, 30 जुलाई 2015

छोटी सी ज़िन्दगी..



ये छोटी सी ज़िन्दगी
पर कोई मिलकर न रह पाये
सब अपने - अपने रास्ते
आयें और चले जायें ।।

कर्म की बेल जो बो जायेंगे
फल उसका तो पाना है
आज भले ही सुख पा लोगे
पर एक दिन शीश झुकाना है ।।

अपने - अपने रास्ते
सबकी अपनी- अपनी सोच
अन्त घडी जब आ जाती है
तब आती है होश ।।

जीते जी रहे धुर विरोधी
आपस में रहा रोष
पर यही तो जग में होता रहा है
फिर मनवा काहे रहा तू सोच

सुशील कुमार पटियाल
१९-०७-२०१५

मंगलवार, 7 जुलाई 2015

वही सयाना है...

कुछ चले गए
कुछ ने अभी जाना है
किसी को जीवन दुश्वर लगता
कोई ढुंढता जीने का बहाना है।।

सब कुछ मान के अपना बैठे
सब साथ में ले जाना हो जैसे
थोडा और कमाऐं पैसे,
भला इस दुनिया के लोग है कैसे।।

समझा जीवन का सत कोई
समझो वही सयाना है
वरना क्या है,,,,,,,,,,,
इक देह छोड के, दूसरी पाना
फिर वापिस यहीं आना है।।

                सुशील कुमार पटियाल

चार दिन की चांदनी

चार दिन की चांदनी
फिर चारों खाने चित
फिर भी नहीं हम जानते
अपना हित और अहित।।

इन चार दिनों के चाव में
देखो चंचल मन की चाल
पल-पल का किसी को नहीं पता
अरमां वर्षों के लिए पाल ।।

चार दिनों की चमक-दमक में
नए सपने संजोए नित
नहीं पता है किसी का यारो
कि कब जाना है मिट    ।।

                              सुशील कुमार पटियाल

Thanks for loving me

Thanks for loving me

Bye bye dear

Bye bye dear