सोमवार, 21 अक्तूबर 2013

कुछ और ही होगा



न हिन्दू न कोई मुसलमान है
जिसमें नहीं है प्यार-मुहब्बत
कुछ और ही होगा ...
मगर नहीं वो कोई इन्सान है ।।
लहू जो बहता है रगों में
अगर नहीं सुर्ख सफेद है
उसी मू्र्ख के हृदय में
रहता ऊँच-नीच का भेद है
खुद को इन्सान कहते हैं
बस इसी बात का खेद है ।।
पल दो पल का जीवन है
ये जीवन बना संग्राम है
जिसमें नहीं है प्यार-मुहब्बत
कुछ और ही होगा
मगर नहीं वो कोई इन्सान है ।।
 
                     
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