सोमवार, 23 अप्रैल 2012

दयनीय दशा है





दयनीय दशा है भारत की
बह रही गंगा स्वार्थ की
भला-भलाई मृत पडे हैं
अर्थी उठ रही परमार्थ की
         दयनीय दशा है भारत की ।।
अपना सब को स्वार्थ दिखता है
अब लेखक खुद के खातिर लिखता है
माना पहले थी दास प्रथा
पर आज खुद देखो इन्साँ बिकता है

इन्साँ का हृदय पत्थर हुआ है
और करता बात यथार्थ की
भला-भलाई मृत पडे हैं
अर्थी उठ रही परमार्थ की
         दयनीय दशा है भारत की ।।

सुशील कुमार पटियाल

Thanks for loving me

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Bye bye dear

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