सोमवार, 9 मई 2011

बेडियाँ

दूर गगन की छाँव में,
बँधी हैं बेडियाँ पाँव में
जहाँ नहीं कोई भी वंधन हो
बस प्रेम प्यार ही बंदन हो
चलो रे मन उस गाँव में
दूर गगन की छाँव में,
बँधी हैं बेडियाँ पाँव में ।।

सुशील कुमार पटियाल

यह कविता मेरे द्वारा जून १७, २००७ को लिखी गई थी।।

मन्दिर, मस्जिद और इन्सान

मन्दिर जाऊंगा
गुरूद्वारे जाऊंगा
मस्जिद जाऊंगा
और जाऊंगा मै चर्च
मेरा भला क्या जाऐगा
क्या होगा मेरा खर्च ।।
ईश तुम्ही मैं बसता है
न महंगा न सस्ता है
बस सीधा सादा रस्ता है
मान लो उसको चाहे जैसे
क्या पडता है भला फर्क
मेरा भला क्या जाऐगा
क्या होगा मेरा खर्च ।।


सुशील कुमार पटियाल

यह कविता मेरे द्वारा जुलाई २७, २००८ को लिखी गई थी।।

ईश तुम्हीं

ईश तुम्हीं इन्सान तुम्हीं
मानो तो भगवान तुम्हीं
ग्यान तुम्हीं अग्यान तुम्हीं
तो रब की पहचान तुम्हीं
निर्धन तुम्हीं, धनवान तुम्हीं
गुणहीन तुम्हीं, गुणवान तुम्हीं
अल्हा तुम्हीं और राम तुम्हीं
सुवह तुम्हीं और शाम तुम्हीं
ईश तुम्हीं इन्सान तुम्हीं
मानो तो भगवान तुम्हीं ।।


सुशील कुमार पटियाल

यह कविता मेरे द्वारा फरवरी १२, २००६
को लिखी गई थी।।

एक इन्सान हूँ

न हिन्दू हूँ
न मुसलमान हूं
मैं तो एक एक इन्सान हूँ
मुझ से गीता
बाइबल मुझ से
मैं ही तो कुरान हूं
मै तो एक इन्सान हूँ ।।
धर्म-कर्म के ये हथकण्डे
जीवन जीने के ये फण्डे
मैं इन सब से अन्जान हूं
मै तो एक इन्सान हूँ ।।
राम मिले, न रहिम मिले
ईश मिले, ने अल्हा
मैं इन सब का पैगाम हूं
मै तो एक इन्सान हूँ ।।
ईश्वर भीतर तेरे भी है
ईश्वर भीतर मेरे भी है
बना फिर भी नादान हूं
ईश प्रेम, मैं प्राण हूं
मैं तो एक इन्सान हूं ।।


सुशील कुमार पटियाल

यह कविता मेरे द्वारा जनवरी ०१, २००६ को लिखी गई थी।।

समानता?

कौन कहता है
सब समान हैं
कोई हिन्दू तो,
कोई मुसलमान है
कोई निर्धन तो
कोई धनवान है
कोई निर्बल तो
कोई पहलवान है
कौन कहता है
सब समान है ।।
कोई हैवान तो
कोई इन्सान है
कोई भरा है जीवन से
तो कोई हुआ बेजान है
किसी को मिलता कफन तक नहीं
तो कोई पाता शमशान है
किसी को लगती
समस्या जटिल ये
तो कोई कहता आसान है
कौन कहता है
सब समान है ।।

सुशील कुमार पटियाल

यह कविता मेरे द्वारा जनवरी ०१, २००६ को लिखी गई थी।।

Thanks for loving me

Thanks for loving me

Bye bye dear

Bye bye dear