शनिवार, 19 मार्च 2011

मीत मतलब के

यहाँ मीत हैं मतलब के सब सारे
मान के सबको अपना हारे
कदम फूंक-फूंक के रखना
मान ले मेरी बात तू प्यारे्
यहाँ मीत हैं मतलब के सारे ।।
सच है क्या उसको पहचान
भले बुरे का कर ले ध्यान
जो ये आँखें तुझे दिखातीं
मिथ्या हैं ये सारे नज़ारे,
यहाँ मीत हैं मतलब के सब सारे ।।
गहरा गर्त है सामने तेरे
पर तुझ को दिखता नहीं है
दिखता है जो इन आँखों से
कहता है बस वही सही है
होता अगर बस यही सही तो
क्यों फिरते यूँ मारे-मारे
यहाँ मीत हैं मतलब के सब सारे

ये कविता २९ - ०६ - २०१० को लिखी गई थी। सुशील कुमार पटियाल

मौत का मातम

मौत का मातम मनाने का
अब वक्त भला है किस को
अंधों कि ये दौड लगी है
देख लो चाहे जिस को
मौत का मातम मनाने का
अब वक्त भला है किस को

सुशील कुमार पटियाल

Thanks for loving me

Thanks for loving me

Bye bye dear

Bye bye dear