सोमवार, 22 अगस्त 2011

भारत मां की इज़्जत

जब मां की इज़्जत लुट रही हो, तो क्या उसके बच्चों को चुप-चाप तमाशा देखना चाहिये या फिर आतताइयों से मुकवला करके उनका अन्त करना चाहिये?

मेरे ख्याल तो हर कोई अपनी मां के लिए लडना चाहेगा चाहे उसकी जान ही क्यों न चली जाए।
दोस्तो आज वही दिन हमें देखने को मिल रहा है, इन भ्रष्ट नेताऒं ने हमारी भारत मां के साथ बदसलूकी की है तो हम चुप कैसे बैठ सकते है।

इन नेताओं ने तो अपना दीन, धर्म, ईमान सब कुछ बेच रखा है।। ये लोग अपनी ही मां की इज़्ज़त लूट रहे हैं इससे बडी शर्म की बात इस देश के लिए क्या हो सकती है।।

इन नेताओं को हमने चुन के भेजा की ये हमारी भारत मां इज़्ज़त मान बढायेंगे, मगर आज तश्वीर आप के सामने है।। मुझे ये सोच के ताज़्जुब होता है कि अन्ना हजारे, बाबा रामदेब जो देश कि बात करते रहे है और जिनके पीछे आज जन सैलाब उमड पडा है, ये सरकार उनके साथ ही बससलूकी कर सकती है तो इस देश में उस आम आदमी की ये सरकार क्या दशा कर सकती ये सोचते हुए भी डर लगता है।

बस यही एक कारण है कि इस देश का आम आदमी अपनी शिकायत दर्ज करवाने से भी डरता है।।

तो आखिर में, मैं यही कहता हुं -
उठो, जागो ऐ देश के पहरेदारो
नहीं तो लुट जाएगा ये यारों
अगर मां की इज़्ज़त भी नहीं बचा सकते
तो तुम्हें लानत है, इस देश के गद्धारो।।

शनिवार, 20 अगस्त 2011

कैसा देश!

ये कैसा देश हमारा है
जहां मरता गरीब बेचारा है
ठोकर मिलती है हर उसको
जिसका नहीं कोई सहारा है।।

तडफ-तडफ के मरते देखो
धनवान से निर्धन डरते देखो
यहां जान की कीमत नहीं है कोई
दिखता हर कोई हारा है।।

हर चीज़ पे बोली लगती है
पर गरीब पे गोली चलती है
नहीं मिलता कुछ भी उधारा है
ये कैसा देश हमारा है।।

टूटते रिस्ते



इन्सां - इन्सां से दूर हो रहा
अब तो घाव ये नासूर हो रहा
सजा-सजा रखे थे अरमां
अब तो हर अरमां है चूर हो रहा।।

सोमवार, 9 मई 2011

बेडियाँ

दूर गगन की छाँव में,
बँधी हैं बेडियाँ पाँव में
जहाँ नहीं कोई भी वंधन हो
बस प्रेम प्यार ही बंदन हो
चलो रे मन उस गाँव में
दूर गगन की छाँव में,
बँधी हैं बेडियाँ पाँव में ।।

सुशील कुमार पटियाल

यह कविता मेरे द्वारा जून १७, २००७ को लिखी गई थी।।

मन्दिर, मस्जिद और इन्सान

मन्दिर जाऊंगा
गुरूद्वारे जाऊंगा
मस्जिद जाऊंगा
और जाऊंगा मै चर्च
मेरा भला क्या जाऐगा
क्या होगा मेरा खर्च ।।
ईश तुम्ही मैं बसता है
न महंगा न सस्ता है
बस सीधा सादा रस्ता है
मान लो उसको चाहे जैसे
क्या पडता है भला फर्क
मेरा भला क्या जाऐगा
क्या होगा मेरा खर्च ।।


सुशील कुमार पटियाल

यह कविता मेरे द्वारा जुलाई २७, २००८ को लिखी गई थी।।

ईश तुम्हीं

ईश तुम्हीं इन्सान तुम्हीं
मानो तो भगवान तुम्हीं
ग्यान तुम्हीं अग्यान तुम्हीं
तो रब की पहचान तुम्हीं
निर्धन तुम्हीं, धनवान तुम्हीं
गुणहीन तुम्हीं, गुणवान तुम्हीं
अल्हा तुम्हीं और राम तुम्हीं
सुवह तुम्हीं और शाम तुम्हीं
ईश तुम्हीं इन्सान तुम्हीं
मानो तो भगवान तुम्हीं ।।


सुशील कुमार पटियाल

यह कविता मेरे द्वारा फरवरी १२, २००६
को लिखी गई थी।।

एक इन्सान हूँ

न हिन्दू हूँ
न मुसलमान हूं
मैं तो एक एक इन्सान हूँ
मुझ से गीता
बाइबल मुझ से
मैं ही तो कुरान हूं
मै तो एक इन्सान हूँ ।।
धर्म-कर्म के ये हथकण्डे
जीवन जीने के ये फण्डे
मैं इन सब से अन्जान हूं
मै तो एक इन्सान हूँ ।।
राम मिले, न रहिम मिले
ईश मिले, ने अल्हा
मैं इन सब का पैगाम हूं
मै तो एक इन्सान हूँ ।।
ईश्वर भीतर तेरे भी है
ईश्वर भीतर मेरे भी है
बना फिर भी नादान हूं
ईश प्रेम, मैं प्राण हूं
मैं तो एक इन्सान हूं ।।


सुशील कुमार पटियाल

यह कविता मेरे द्वारा जनवरी ०१, २००६ को लिखी गई थी।।

समानता?

कौन कहता है
सब समान हैं
कोई हिन्दू तो,
कोई मुसलमान है
कोई निर्धन तो
कोई धनवान है
कोई निर्बल तो
कोई पहलवान है
कौन कहता है
सब समान है ।।
कोई हैवान तो
कोई इन्सान है
कोई भरा है जीवन से
तो कोई हुआ बेजान है
किसी को मिलता कफन तक नहीं
तो कोई पाता शमशान है
किसी को लगती
समस्या जटिल ये
तो कोई कहता आसान है
कौन कहता है
सब समान है ।।

सुशील कुमार पटियाल

यह कविता मेरे द्वारा जनवरी ०१, २००६ को लिखी गई थी।।

शनिवार, 19 मार्च 2011

मीत मतलब के

यहाँ मीत हैं मतलब के सब सारे
मान के सबको अपना हारे
कदम फूंक-फूंक के रखना
मान ले मेरी बात तू प्यारे्
यहाँ मीत हैं मतलब के सारे ।।
सच है क्या उसको पहचान
भले बुरे का कर ले ध्यान
जो ये आँखें तुझे दिखातीं
मिथ्या हैं ये सारे नज़ारे,
यहाँ मीत हैं मतलब के सब सारे ।।
गहरा गर्त है सामने तेरे
पर तुझ को दिखता नहीं है
दिखता है जो इन आँखों से
कहता है बस वही सही है
होता अगर बस यही सही तो
क्यों फिरते यूँ मारे-मारे
यहाँ मीत हैं मतलब के सब सारे

ये कविता २९ - ०६ - २०१० को लिखी गई थी। सुशील कुमार पटियाल

मौत का मातम

मौत का मातम मनाने का
अब वक्त भला है किस को
अंधों कि ये दौड लगी है
देख लो चाहे जिस को
मौत का मातम मनाने का
अब वक्त भला है किस को

सुशील कुमार पटियाल

Thanks for loving me

Thanks for loving me

Bye bye dear

Bye bye dear