बुधवार, 10 फ़रवरी 2010

मिथ्या अभिमान

मौत को मात दो तो माने
मुर्दे को सांस दो तो माने
समन्दर खारा भरा पडा है
मीठा कर दो तो माने
मौत को मात दो तो माने ।।
धरती के धरातल पे
पाँव रखने की जगह नहीं
बढती हुई आबादी को,
नई धरती दिला दो तो जाने
मौत को मात दो तो माने ।।
आग का अविष्कार किया
जल से बिजली दी बना
मन ही मन देखो फूल गया
मस्तक ऊँचा लिया उठा
पर कब से जाने सूर्य खडा है
न किञ्चित भी अभिमान भरा
झूठे उठे इस मस्तक को
प्रेम सिखा दो तो जाने
मौत को मात दो तो माने ।।


सुशील कुमार 'पटियाल'
यह कविता नवम्बर ५, २००९ को ११AM पर लिखी गई थी
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