बुधवार, 10 फ़रवरी 2010

मिथ्या अभिमान

मौत को मात दो तो माने
मुर्दे को सांस दो तो माने
समन्दर खारा भरा पडा है
मीठा कर दो तो माने
मौत को मात दो तो माने ।।
धरती के धरातल पे
पाँव रखने की जगह नहीं
बढती हुई आबादी को,
नई धरती दिला दो तो जाने
मौत को मात दो तो माने ।।
आग का अविष्कार किया
जल से बिजली दी बना
मन ही मन देखो फूल गया
मस्तक ऊँचा लिया उठा
पर कब से जाने सूर्य खडा है
न किञ्चित भी अभिमान भरा
झूठे उठे इस मस्तक को
प्रेम सिखा दो तो जाने
मौत को मात दो तो माने ।।


सुशील कुमार 'पटियाल'
यह कविता नवम्बर ५, २००९ को ११AM पर लिखी गई थी

साथ क्या जायेगा

सोचो - साथ क्या जायेगा
मिली देह ये तन मिला,
ये भी यहीं रह जायेगा
सोचो - साथ क्या जायेगा ।।
साथ यहीं के यहीं रहेंगे
मर गया देखो, सभी कहेंगे,
चाहे कितना देह को सजाए जा
सोचो - साथ क्या जायेगा ।।
न संग जायेगा पैसा प्राणी
न बन मूर्ख तू अभिमानी,
बीजेगा जो आज यहां तू
कल फिर वापिस वही पायेगा,
सोचो - साथ क्या जायेगा ।।



सुशील कुमार पटियाल
दिनांक ०७-११-२००९ को लिखी गई यह कविता!

मेरा धर्म है मानवता

मेरा धर्म है मानवता
जो प्रेम प्यार सिखाता है,
धर्म नहीं है वह मेरा
दूरी दिलों में बढाता हैं ।।
फर्क है केवल सोच का
इसमें धर्म का क्या दोष था,
धर्म तो दिलों को मिलाता है
मेरा धर्म है मानवता,
जो बस प्रेम-प्यार सिखाता है ।।


सुशील कुमार पटियाल
दिनांक ०९-११-२००९ को लिखी गई यह कविता!

नेता की ज़ुबानी (व्यंग्य्)

साम दाम और दण्ड भेद
की नीति हम अपनाते हैं
कुर्सी से हमें प्यार बडा है व्यंग्य
न कत्ल करने से कतराते हैं
साम दाम और दण्ड भेद
की नीति हम अपनाते हैं।।
हम नेता हैं इस देश के
हम ही तो कर्णधार हैं
हम ही इन्सां हम ही देवता
सब जन अपना औज़ार हैं
खुल के खोलें वाणी अपनी
न कभी शर्माते हैं
साम दाम और दण्ड भेद
की नीति हम अपनाते हैं।।
हमसे ही तो हित देश का
दुनिया दीन लाचार है
हम जो कह दें हो जाता है
हम मुखिया, देश ये मूढ-गंवार है
दुनिया रोए या चिल्लाए
हम तो अपना राग बजाते हैं
साम दाम और दण्ड भेद
की नीति हम अपनाते हैं।।
रिश्वत की रेस (दौड) में
भागें किसी भी भेष में
अपना तो रिश्वत ही संसार है
हमें पैसे से वडा प्यार है
हम सेवा करेंगे, सेवा करेंगे
कहके, जनता को वहकाते हैं
साम, दाम और दण्ड भेद
की नीति हम अपनाते हैं।।

मोवाइल - ९२१०९८६५७५ (०४-११-२००९ को ४:४३ मिन्ट पर रचित)
सुशील कुमार पटियाल

नेता की ज़ुबानी (व्यंग्य्)

साम दाम और दण्ड भेद

की नीति हम अपनाते हैं

कुर्सी से हमें प्यार बडा है व्यंग्य

न कत्ल करने से कतराते हैं

साम दाम और दण्ड भेद

की नीति हम अपनाते हैं।।



हम नेता हैं इस देश के

हम ही तो कर्णधार हैं

हम ही इन्सां हम ही देवता

सब जन अपना औज़ार हैं

खुल के खोलें वाणी अपनी

न कभी शर्माते हैं

साम दाम और दण्ड भेद

की नीति हम अपनाते हैं।।



हमसे ही तो हित देश का

दुनिया दीन लाचार है

हम जो कह दें हो जाता है

हम मुखिया, देश ये मूढ-गंवार है

दुनिया रोए या चिल्लाए

हम तो अपना राग बजाते हैं

साम दाम और दण्ड भेद

की नीति हम अपनाते हैं।।



रिश्वत की रेस (दौड) में

भागें किसी भी भेष में

अपना तो रिश्वत ही संसार है

हमें पैसे से वडा प्यार है

हम सेवा करेंगे, सेवा करेंगे

कहके, जनता को वहकाते हैं

साम, दाम और दण्ड भेद

की नीति हम अपनाते हैं।।





सुशील कुमार पटियाल

मोवाइल - ९२१०९८६५७५ (०४-११-२००९ को ४:४३ मिन्ट पर रचित)

Thanks for loving me

Thanks for loving me

Bye bye dear

Bye bye dear