मंगलवार, 16 सितंबर 2008

यह कैसी गुंडागर्दी है

यह कैसी गुंडागर्दी है ?
सबकी अपनी मनमर्जी है।

पुलिस मिली अपराधी से
नेता भी खूब कमाता है
व्यापारी लूट रहा सबको
इन तीनों ने हद कर दी है।
यह कैसी गुंडागर्दी है ?

कहीं किसी को काम नहीं
कहीं चलती डिग्री फर्ज़ी है,
हम जाएं तो भी जाएं कहा,
झूठी सबकी हमदर्दी है।
यह कैसी गुंडागर्दी है ?
यह कैसी गुंडागर्दी है ?


सुशील कुमार पटियाल
(हिमाचल प्रदेश)

बांधो ना मुझे तुम बंधन में

बांधो न मुझे तुम बंधन में,
बंधन में मैं मर जाऊंगा !
उन्मुक्त गगन का पंछी हूं,
उन्मुक्त ही रहना चाहूंगा !

मिल जाए मुझे कुछ भी चाहे ,
पर दिल को मेरे कुछ भाए ना !
मैं गीत खुशी के गाता था,
मैं गीत ये हरदम गाऊंगा !

उन्मुक्त गगन का पंछी हूं ,
उन्मुक्त ही रहना चाहूंगा !

सुशील कुमार पटियाल, हिमाचल प्रदेश

अकेलेपन की व्यथा

इस अकेलेपन की दवा है क्या,
जीवन लगता व्यर्थ गया,
खुद पर आती हमें दया,
इस अकेलेपन की दवा है क्या।

अपना यहां पर लगे कोई ना,
चलन संभल के कहीं छाले कोई ना,
दूर दीवानों का घर है
यहां तो सब है नया-नया
इस अकेलेपन की दवा है क्या।

सुशील कुमार पटियाल,
हमीरपुर, हिमाचल प्रदेश

ईंट-पत्थर के जंगल

ये बिल्डिंगों के घने जंगल,
जहां इंसान-इंसान के खून का प्यासा
कर रहे जी भर के दंगल
ये बिल्डिंगों के घने जंगल।

सब कुछ सामने दिखता फिर भी,
फिर भी अंधियारा छाया है
क्या कुदरत ने या फिर
खुद इंसान ने इसे बनाया है।

बिल्डिंगों के इस घने जंगल में
ना शेर मिलता है, चीता
यहां तो इंसान ही इंसान का
खून पी के है जीता।

सुशील कुमार पटियाल

मन

मानव मन एक पक्षी है जो उड़ता है चहुं ओर
भटक रहा है यहां-वहां एक छोर से दूजे छोर

ज्यादा पाने की इच्छा में कम भी हाथ से जाता
ज्यादा नहीं मिलता फिर भी कम से काम चलाता

मन की गति न रुकती फिर भी ज्यादा को है जी ललचाता
कट जाए चाहे सिर फिर भी बुरे कामों से जी बहलाता

ज्यादा मिल जाता फिर भी और ज्यादा पाने की जी चाहता
बुरे काम करते-करते चरम सीमा लांघ जाता

मन की मति पर चलो न यारो, मन चंचल मन चोर
भटक रहा है यहां-वहां, इक छोर से दूजे छोर

मन को स्थिर रखना जो जाने कर सकता है हर काम
काम क्रोध और लोभ, मोह से दूर रहे सुबह-शाम

मन का पलड़ा भारी हो तो दियो ज्ञान का बोझ
मन की गति रुक जाएगी करिए इसका शोध

सुशील कुमार पटियाल
हमीरपुर, हिमाचल प्रदेश

है अपनी ही सरकार !

लोगों की सरकार है भाई
देखो ध्यान लगाकर ,
चले इकट्ठे होकर हैं सब
अपने-अपने हाथ फैलाकर।

मांगे लेकर पहुंच गए अब
एम.एल.ए. के दफ्तर ,
और की फरियाद
जो करते आए हैं अक्सर।

खोलो अपने कपाट प्रभु जी
हम पड़े हैं तुम्हरे द्वारे ,
पानी , राशन और चारे की
चिंता में फिरते मारे-मारे।

नेता जी की नींद टूट गई
बोले वह बड़बड़ाकर ,
और नहीं तुम्हें काम कोई क्या
जो शोर मचाते हो यहां आकर।

जाओ बैठो बाहर बेंच पर
करते हैं हम विचार ,
पर देखो घबराना नहीं
है अपनी ही सरकार।

सुशील कुमार पटियाल
हमीरपुर , हिमाचल प्रदेश

बीते वर्ष पचास

बीते वर्ष पचास
बहुत कुछ हुआ खास
मगर वो जो गरीब हैं
अब भी लगाए बैठे हैं आस
कि शायद कोई सेठ
खोलेगा कार की खिड़की
और पूछेगा
ये तिरंगा कितने का दे रहे हो ?
इतना सुनते ही खिल जाएगा चेहरा
चलो कोई देशभक्त है !!

आज मना रहे हैं हम
58वां गणतंत्र, मगर
नहीं मिला अब तक गरीबी हटाने का मंत्र
ये कैसी दुविधा में भारत है
क्यों गड़बड़ाया है इसका सारा तंत्र !!

सुशील कुमार पटियाल
हिमाचल प्रदेश

सोमवार, 15 सितंबर 2008

जंग

जीवन की इस जंग में मानव
क्यों हु्ए तुम इतने उदास
लडना है तुम्हें हर कठिनाई से
जब तक है आखिरी स्वास ।।
मंजिल तेरी चाहे दूर भी हो पर
न होना कभी निराश
कदम पे कदम बढाए जा तू
पहुंचेगा एक दिन अपनी मंजिल के पास ।।
साथ तेरा देने को कोई नहीं है
रखना न कभी किसी की आस
जीवन तो एक जंग है प्यारे
लडना इसको रख के विस्वास ।।
मंजिल को तुम्हें पाना है
दौडो तुम इतना आज
देश का भी भला हो जिस से
ताकि, सबको हो तुम पे नाज़ ।।
अभी जिन्दगी तेरी नीरस पडी है
मंजिल पा के रसवान बनेगी
थक कर हार न जाना मानव
जीवन की न फिर चाल थमेगी ।।
जीवन की जंग में प्यारे
दुखों का है भण्डार
पागल है वो घोडा
जिस पे होना है तुझे सवार ।।
ऐ मानव इस जीवन में
हर चुनौती को तू कर स्विकार
विजय पानी है तुझ को प्यारे
ये कहे "सुशील कुमार पटियाल"

सुशील कुमार पटियाल

डर

डर - डर के जीना भी
क्या कोई जीना है
इस से तो अच्छा
ज़हर पीना है ।।

सुशील कुमार पटियाल

रिक्शे वाला

रिकशेवाला , सीधा-सादा
भोला - भाला
मन से सुन्दर, तन से काला
हाथ में हैंडल
पाँव में पैंडल
माथे पे पसीना
सच पुछो तो है यही जीना !!
कडी महनत ये करता है
तोडे न कभी किसी का ताला
धन्य है वो मैय्या, भैया
जन्मा जिस ने ये रिक्शेवाला !!


सुशील कुमार पटियाल

शांति संदेश

शांति संदेश हमें यारो जगह-जगह पहुंचाना है
चलो साथ मेरे दोस्तो कहो किस-किस ने जाना है

लड़ाई-झगड़े नित देख रहे हम चलो इन्हें हमें मिटाना है
चलो साथ मेरे दोस्तो क्योंकि शांति संदेश हमें जगह-जगह पहुंचाना है

मार-धाड़ और मारपीट, इन घटनाओं को हमें घटाना है
चलो साथ मेरे दोस्तो, भूले को रास्ता दिखाना है

कोई शराबी गिरता संभलता, आया नया जमाना है
पड़ा रहा अंजान गली में, नहीं पता कहां ठिकाना है

आवाज उठाने को उठ जाए तो कहे दुनिया उसे दीवाना है
बिछड़ रहे दो भाइयों को फिर से हमें मिलाना है

इक दूजे के लिए मिट जाएं हम, देश को महान बनाना है
चलो साथ मेरे दोस्तो, देश का झंडा हमें उठाना है

प्रगति पथ पर तुमको प्यारे हर दम बढ़ते जाना है
अच्छाई का साथ दे तू, बुराई को तुझे हराना है

छुपी हुई है हर शक्ति तुझमें, हर बात मरदाना है
पांव सही पथ पर हो तो तुझे नहीं शरमाना है

शराब, तंबाकू की लत छोड़ो, भविष्य बच्चों का बचाना है
छोड़ दे ये सब प्यारे तू, प्रगति में हाथ बंटाना है

सुशील तुम्हें बतलाता यारों, हैं अपने सभी नहीं कोई बेगाना है
चलो साथ मेरे दोस्तो शांति संदेश हमें जगह-जगह पहुंचाना है

माना चला अकेला है तू, नहीं अलबेला, तू अंजाना है
मुश्किलें भी तेरे सामने होंगी, पर तुझे नहीं घबराना है

बस यार मेरे तुझे निस्वार्थ भाव से कदम बढ़ाना है
चलो साथ मेरे दोस्तो शांति संदेश हमें जगह-जगह पहुंचाना है

सुशील कुमार पटियाल
हमीरपुर, हिमाचल प्रदेश

जागो ऐ नौजवाँ

झूठी शान को छोड के प्यारे
सच को गले लगा ले
सकल समाज है तेरा अपना
देश के खातिर खुद को मिटा ले ।।
आजा़दी जिन्होंने दिलाई हमको
आजा़दी जिन्होंने उपहार दे दिया
अपनी जान गँवा के
भाग न जाना ऐ नौजवाँ
कहीं अपनी जान बचा के ।।
देश की आजा़दी का इतिहास
बडा लम्बा है भाई
हो शिखर पे अपना देश
सदा खरी करो कमाई ।।
देश में हैं जो बुरी कुरितियां
उन्हें मिटाना है तुम्हें आज
जागो ऐ नौ - जवान
बनाओ नया सुखी समाज ।।
भूल न जाना उन को तुम
खुद को देश हित में लुटा दे
रह न जाना कहीं तू गुम ।।
आज देश में फैल रहा है जो ज़हर
मिटाने के लिए तू ज उस पे
टूट जा बन के क़हर
ताकि खुशी रहे गाँव देश का
खुशी रहे हर अपना शहर ।।
भ्रष्टाचार की राजनीति में
बह रही है जो नहर
मिटा दे उस को
तभी आ सकेगी खुशी की लहर ।।
देश की सुरक्षा का भार ऐ नौजवानो -
तुम पे पडा है आज,
चुक न जाए कहीं निशाना
खुशहाल बनेगा तभी समाज ।।
सपने उनके हमें हैं पूरे करने
थे चाहते जिन्हें देशभक्त,
आजा़दी जिन्होंने दिलाई हमको
बहा के अपना रक्त ।।
सुशील कुमार पटियाल

उतार - चढाव

जिन्दगी से जो तंग है
नहीं उस में कोई उमंग है
वो क्या जाने क्या है जिन्दगी
सच कहूं तो ये ज़ग है ।।
हार कर होई है बैठता
कोई बैठ कर है हारता
वो मूर्ख नादान है
जो जीवन नहीं सुधारता ।।
जीवन जंग है,
इसमें है उल्लास रे
आज जो दूर है तेरी मंजिल
होगी एक दिन तेरे पास रे ।।
भाग न इन परिस्थितियों से
क्योंकि ये ही तुम्हें सिखाती हैं
जिन्दगी क्या है - है हौंसला !
ये बार - बार बतलाती है ।।

सुशील कुमार पटियाल

भेडचाल क्यों ?

जाने भेडचाल क्यों हम चलते जाते
खुद क्यों न कोई रास्ता बनाते
यूं तो इस जग में
सब ही हैं आते - जाते
जाने खुद कोई रास्ता क्यों नहीं बनाते ।।
भीड - भाड में खो जाना
क्या यही जीवन हमारा है
अस्तित्व न अपना कहीं खो जाए
जो वास्तव में हमारा है ।।
भीड से कट कर चलने वाले
ही शायद कुछ पाते हैं,
भीड में चलने वाले यारो
भीड में ही खो जाते हैं ।।
जाने खुद क्यों न हम,
ये सोच हैं पाते
क्यों भेडचाल हम चलते जाते
क्यों नहीं कोई अस्तित्व हमारा
क्यों अकेले नहीं हम चलने पाते?
जाने क्यों हैं हम घबराते
क्यों भेडचाल हम चलते जाते ।।

सुशील कुमार पटियाल

चलो प्रिये !

चलो प्रिये उस पार चलें
उस पार जो घोर अंधेरा है
नया उजाला ले जाऐंगे
ले जाना हमें सवेरा है,,,,,,,
चलो प्रिये उस पार चलें
उस पार जो घोर अंधेरा है ।।

इस कालख से डर कैसा
जो साथ तुम्हारा मिल जाए
कुम्हलाए हुए इन पष्पों को
नवजीवन फिर से मिल जाए
छोड के जग जाना सब को
जो न तेरा न मेरा है
चलो प्रिये उस पार चलें
उस पार जो घोर अंधेरा है ।।

कहीं भटक न जाएं वहां जा के हम
मशाल प्रेम कि लिए चलेंगे
दम न निकले इस पार कहीं ये
उस पार जाके साथ मरेंगे
यहां तो जीवन में अपने
तन्हाइयों का डेरा है,
उस पार प्रिये मैं होउंगा और तुम होगी
शायद अब नहीं यहां कुछ मेरा है
चलो प्रिये उस पार चलें
उस पार जो घोर अंधेरा है ।।

सुशील कुमार पटियाल

गंगा मैय्या कहती है........

आज देश के हर गली में
हर कूचे में -
स्वार्थ की गंगा बहती है
गंगा को भी अपवित्र कर दिया
स्वयँ गंगा मैय्या कहती है ।।
देश की गंदगी का भार
गंगा मैय्या सहती है
ये मैं नहीं -
स्वयँ गंगा मैय्या कहती है ।।
पवित्र होने न जाने
कितने यहाँ पे आते हैं
स्वयँ पवित्र होते हैं पर
तट पे गंदगी फैला जाते हैं ।।
देश के हर कोने से
कई नदियां बहती हैं
ये मैं नहीं -
स्वयँ गंगा मैय्या कहती है ।।
गंदगी दूर हटाओ यारो
है यदि शुद्ध मन से जिना
अमृत जल न रहेगा फिर ये
पडेगा तुमको ज़हरये पीना ।।
जाने सब कुछ मानव फिर भी
हर तट पे गंदगी रहती है
ये मैं नहीं...........ये मैं नहीं
स्वयँ गंगा मैय्या कहती है ।।

सुशील कुमार पटियाल

काश हम भी बच्चे होते!

काश हम भी !
बच्चे होते
कितने सुन्दर
सच्चे होते
बात-बात पर हँसते
बात-बात पर रोते
काश हम भी !
बच्चे होते ।।

मन साफ
न कोई छल होता
जी भर के
लेते हम निदिया
सुन्दर सपनों में हम खोते
काश ! हम भी बच्चे होते ।।

सुशील कुमार पटियाल

मंगलवार, 2 सितंबर 2008

राजनीति के खेल

राजनीति के इस खेल में
करते एक दूजे की बुराई
जनता को उपदेश देते हैं पर,
स्वयं देश में अराज़कता फैलाई ।।
खुद को सच्चा बतलाते हैं
दुजे को कहते हैं चोर
स्वयं तोड रहे देश को
फैला रखा है अंधेरा घनघोर ।।
कुर्सी से उन्हें प्यार है
क्या जनता से लेना
हम बनाएंगे देश को कहते
वोट हमें ही देना .................।।
जनता भी है भोली - भाली
करती अपना वोट बेकार
सहज ही बातों में उनकी आते
कुर्सी पे हो जाता फिर एक भ्रष्टाचारी सवार ।।
राजनीति के इस खेल को
जनता समझ न पाती
सत्ता में ज्यों ही भ्रष्टाचारी आते
भोली जनता फिर बडी पछताती ।।
दोस्तो खोलो आंखे अपनी
समझो राजनीति की ये चाल
लूट रहे भ्रष्टाचारी सबको
हुआ देश का है बुरा हाल ।।
जाति धर्म के आधार पर
बोट बनाएं और करते व्यापार
सत्ता में आने को सबकुछ करते
ये बात बताऐ 'सुशील कुमार' ।।

सुशील कुमार पटियाल
गांव मसलाणा खुर्द
डाक घर झञ्जियाणी
तहसील बडसर, हमीरपुर
हिमाचल प्रदेश

Thanks for loving me

Thanks for loving me

Bye bye dear

Bye bye dear