बुधवार, 30 जुलाई 2008

मानव की गाडी

मानव की गाडी
जीवन पथ पर दौड रही है
कुचल रही जो सामने आए
पिछड गया उसे छोड रही है
रिस्ते नाते अब किसको भाते
सब जंजीरें तोड रही है
मानव की गाडी
जीवन पथ पर दौड रही है ।।
झूठ - फरेब का फूले धन्धा
सच्चे का भई धन्धा मन्दा
आँख भी है पर फिर भी अन्धा
अन्यायी घुमते हैं खुलेआम
सच्चे के लिए फाँसी का फंदा
अब तो कुछ बतलाओ यारो
क्या गलत और क्या सही है
जो सामने है -
क्या सच नहीं है ?
मानव की गाडी
जीवन पथ पर दौड रही है ।।
मानव - मित्र - भाईचारा
पैसे ने सब कुछ विसारा
धूँवा - रोली मची हुई है
शर्मो - हया कहाँ मची हुई है
कैसा ये खुशियों का पिटारा
जो कुछ है अजी पास हमारे
सब से नाता तोड रही है
मानव की गाडी
जीवन पथ पर दौड रही है ।।

सुशील कुमार पटियाल
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