गुरुवार, 31 जुलाई 2008

किसे परवाह

किसे यहां किसकी परवाह
मिट जाती है पल में चाह
इस बात का तो है खुदा गवाह
किसे यहां किसकी परवाह ।।
प्यार व्यार ये दुनियादारी
पैसे पे दुनिया पागल सारी
पैसा तोडे रिस्ते सारे
करता हूँ मैं तुम्हें आगाह
किसे यहां किसकी परवाह ।।
तू न होगा -
खातिर तेरे कोई न रोगा (रोएगा)
याद नही कभी करेगा कोई
हो जाओगे जब स्वाह
किसे यहां किसकी परवाह ।।

सुशील कुमार पटियाल

वक्त कभी तो..........

वो वक्त कभी तो आएगा
आसमाँ पे छाएगा
धरती और आकाश का
फासला मिट जाएगा
वो वक्त कभी तो आएगा
माना इस ओर अंधेरा है
देखो उस ओर सवेरा है
इस ओर भी उजाला आएगा
और हमें जगाएगा -
वो वक्त कभी तो आएगा ।।
आज ये पानी सूख रहा है
मछली का दिल टूट रहा है
जो दूर घटा है बदली की
जान वही है मछली की
फिर भी है वो आश लगाए
कि ये बादल वारिष लाएगा
और जीवन उसे दे जाएगा
वो वक्त कभी तो आएगा ।।


सुशील कुमार पटियाल

थी तमन्ना

कुछ कर गुजरने की
थी तमन्ना
जो बस दिल में रह गई
कुछ नहीं कर पाए हो तुम
कानों में ये कह गई................।।
हम चुपचाप सुनते रह गए
और तमन्ना से कह गए
क्यों पानी बन के तुम बह गई
कुछ कर गुजरने की
थी तमन्ना
जो बस दिल में रह गई..............।।




सुशील कुमार पटियाल

कल न होगा

जो आज है वो
कल न होगा
न मैं ही रहूंगा
न तू ही होगा
फिर काहे शोर मचाना है
आखिर सब को जाना है
आँख खुली है, सब देख रहा है
बन्द होगी तो कुछ न होगा
न मैं ही रहूंगा
न तू ही होगा ...............।।
मौत है क्या -
एक नींद है मीठी
फिर काहे घबराना है
आखिर सब को जाना है
आज जो तेरे अपने हैं
सब खुली आँखों के सपने हैं
कल साथ न तेरे कोई होगा
न मैं ही रहूंगा
न तू ही होगा ...............।।


सुशील कुमार पटियाल

कब होंगे आजा़द हम

कब होंगे आजा़द हम
कब होंगे आवाद हम
कब मिटेंगे फासले
कब होंगे सब सम ।।
दिलों में दूरी बढती जाए
प्रेम की सांसे ढलती जाएं
पास है सब कुछ अपने फिर भी
लगता है कि है ये कम
कब होंगे आजा़द हम ।।
आजा़दी तो यह नाम की है
दुनिया सारी दाम की है
आजा़द वही है, है जिस में दम
कब होंगे आजा़द हम ।।
कहा बापू ने और कहा नेहरू ने
क्या सुभाष था कह गया
क्या सपने थे उनके प्यारे
क्या आखिर ये रह गया
भूल गए सब -
न आँख किसी की होती नम
कब होंगे आजा़द हम
कब होंगे सब सम ।।

सुशील कुमार पटियाल

काश ऐसा होता !

काश ! कभी कुछ ऐसा होता
हँसता हर कोई, कोई न रोता
होता बडा न कोई छोटा होता
काश ! कभी कुछ एसा होता ।।
कर्ज न होता दर्द न होता
न गर्मी आती -
न मौसम ये सर्द ही होता
चिन्ता कभी न कोई होती
निश्चिन्त होकर हर कोई सोता
काश ! कभी कुछ एसा होता ।।
तकरार न होती -
बस प्यार ही होता
प्यार न होता, संसार न होता
प्यार बिना बेकार सब होता
प्यार ही प्यार जहाँ में होता
हँसता हर कोई - कोई न रोता
काश ! कभी कुछ एसा होता ।।

सुशील कुमार पटियाल

बुधवार, 30 जुलाई 2008

एक बहाना

आऒ ढूंढें एक बहाना
दर्द भरा है जीवन माना
सीखो यारो दर्द भुलाना
सुख - दुख तो है आना जाना
आऒ ढूंढें एक बहाना ।।
साथ रहेगा तेरे ज़माना
जो दर्द में भी मुस्कराऒगे
जिस आँक से देखोगे
जीवन वैसा पाऒगे
बनना पडेगा तुझे दिवाना
आऒ ढूंढें एक बहाना ।।
जो दर्द भुलाना सीखोगे
तो मन को अपने जीतोगे
खोजोगे खुशियों का ख़जाना
दर्द भरा है जीवन माना
आऒ ढूंढें एक बहाना ।।

सुशील कुमार पटियाल

खुला सा आसमान हो

वो खुला सा आसमान हो
न कहीं कोई अंजान हो
न इंसान के दाम हों
न नफरत की शाम हो
न मदिरा का ज़ाम हो
न मुल्ला, न राम हो
बस प्यार का पैगाम हो
वो खुला सा आसमान हो।।
न भूखा कोई हो
न नंगा हो
सब का अपना धंधा हो
न हाथ में किसी के डंडा हो
बस प्यार ही जीने का फंडा हो
न अपना कोई अंजान हो
बस प्यार का पैगाम हो
वो खुला सा आसमान हो ।।

सुशील कुमार पटियाल

ये तंग-तंग जहान है

वो खुला-खुला सा आसमान
ये तंग-तंग जहान है
वहाँ प्यार का फरमान था
यहाँ अपना भी अंजान है
वो खुला-खुला सा आसमान
ये तंग-तंग जहान है ।।
इंसान नहीं इंसान यहाँ
हैवानियत का रूप है
तन से सुंदर दिखते हैं पर
मन से बडे कुरूप हैं
उम़्र तो यारो ढलती है
यहाँ चाह बनने की नौजवान है
वो खुला-खुला सा आसमान
ये तंग-तंग जहान है ।।

सुशील कुमार पटियाल

काश़ हम भी बच्चे होते

काश हम भी बच्चे होते
कितने सुंदर, सच्चे होते
बात-बात पे हँसते
बात-बात पे रोते
काश हम भी बच्चे होते।।
मन साफ-
न कोई छल होता
जी भर के लेते हम निंदिया
सुंदर सपनों में हम खोते
काश हम भी बच्चे होते।।

सुशील कुमार पटियाल

गुलाम

हम कल भी गुलाम थे
आज भी गुलाम हैं
ना कल ही खास थे
ना आज ही आम हैं।।

सुशील कुमार पटियाल

इंसान यहाँ पर बिकते हैं

इंसान यहाँ पर बिकते हैं
कुछ होते पैदा, कुछ मिटते हैं
कुछ करते हैं हवा से बातें
कुछ पाँव यहाँ पे घिसते हैं
ये इंसानो की धरती है
इंसान यहाँ पर बिकते हैं।।

सुशील कुमार पटियाल

पक्की यारी

बेरोजगारी से पक्की यारी
नौकरी ढूंढे दुनिया सारी
जूते घिस गए
मिला कुछ नहीं
देखने लायक दशा हमारी
बेरोजगारी से पक्की यारी ।।
नौकरी होती, छोकरी होती
पैसा होता -
न जीवन अपना ऐसा होता
न भटकते बनके यूं भिखारी
नौकरी ढूंढे दुनिया सारी
बेरोजगारी से पक्की यारी ।।
जाएं कहां हम किसके पीछे
दबे पडे हैं कर्ज के नीचे
रंगत खोती इस बगिया को
सींचे कैसे हम बिन पानी
बने हुए हैं कैदी जैसे -
तोडे कैसे ये चार दिवारी
बेरोजगारी से पक्की यारी ।।


सुशील कुमार पटियाल

पहचान

मेरा अस्तित्व
मेरी पहचान
वही दो आँखें
वही दो कान ।।
सुशील कुमार पटियाल

मानव की गाडी

मानव की गाडी
जीवन पथ पर दौड रही है
कुचल रही जो सामने आए
पिछड गया उसे छोड रही है
रिस्ते नाते अब किसको भाते
सब जंजीरें तोड रही है
मानव की गाडी
जीवन पथ पर दौड रही है ।।
झूठ - फरेब का फूले धन्धा
सच्चे का भई धन्धा मन्दा
आँख भी है पर फिर भी अन्धा
अन्यायी घुमते हैं खुलेआम
सच्चे के लिए फाँसी का फंदा
अब तो कुछ बतलाओ यारो
क्या गलत और क्या सही है
जो सामने है -
क्या सच नहीं है ?
मानव की गाडी
जीवन पथ पर दौड रही है ।।
मानव - मित्र - भाईचारा
पैसे ने सब कुछ विसारा
धूँवा - रोली मची हुई है
शर्मो - हया कहाँ मची हुई है
कैसा ये खुशियों का पिटारा
जो कुछ है अजी पास हमारे
सब से नाता तोड रही है
मानव की गाडी
जीवन पथ पर दौड रही है ।।

सुशील कुमार पटियाल

महिला बिना

महिला माँ है
महिला छाँव है
महिला बिना
अधुरा संसार
महिला बिना है
मृत नर भी
महिला बिना है
सूना घर भी
न महिला का
करो व्यापार
महिला बिना
अधुरा संसार ।।
भ्रूण बेटी को
मारा किस ने
कैसी मानव की
वो किस्में
अरे निशीचर
बंद करो ये अत्याचार
महिला बिना
अधुरा संसार ।।
महिला अब तुझे
उठना होगा
इस दैत्य को
आगे तेरे झुकना होगा
हैं तेरे भी कुछ
मौलिक अधिकार
नहीं रही अब
तु लाचार
महिला बिना
अधुरा संसार ।।



गाँव मसलाणा खु्र्द,
डाक घर झञ्जियाणी
तहसील बडसर, जिला हमीरपुर
हिमाचल प्रदेश
पिन - १७४३०५
मोबाइल - ०९९९०१७२५१४

मंगलवार, 29 जुलाई 2008

रुप बेचने मैं चली

रुप बेचने मैं चली
छोटे कपडे डाल के
सोचती हूं सब दर्शन कर लें
जो पहने हैं बो भी उतार दे ।।
मैं हूं पुजारन पैसे की
न जिस्म बेचती ऐसे ही
चाहे मुझ को नंगा कर दो
मिल जाएं पैसे जैसे ही ।।


सुशील कुमार पटियाल

दिशा

होता न जो यार मेरा
मुझ को दिशा दिखाता कौन?
आँख मूंदे खोया रास्ता
बिना उसके पुकार लगाता कौन ?
भटका था जो ये मन मेरा
उसे राह पे लाता कौन
खुद ही समझ न पा रहा
यार बिना समझाता कौन !
अपनी धुन में मगन हुआ था
घूम रहा था बनकर डॉन
होता न यदि यार मेरा
सही राह दिखलाता कौन ?
अंधियारा दिल में भरा हुआ था
चुपचाप पडा था मैं भी मौन,
यार है मेरा लाखों में एक
बिन उसके उजियारा दिखलाता कौन ?
खुली नीं में सोया था
झूठे सपनों की थी पौन,
अगर न होता यार मेरा तो
सच का एहसास कराता कौन ?
यार हो सबका एसा यारो
यारी में नहीं होती कौम
भटके हुए इस मेरे मन को
दिशा आज दिखलाता कौन ।।

सुशील कुमार पटियाल

संसद के अन्दर

नेता भी बन्दर
अभिनेता भी बन्दर
एक पर्दे पे उछले
एक संसद के अन्दर ।।

सुशील कुमार पटियाल

स्रेष्ट है कौन ?

आज के मानव को देखो प्यारे
हुआ कितना हैवान,
देवताओं को खुश करने को
पशुओं का करते बलिदान।।
राक्षस इन्हें कलयुग का कहें तो
गलत न होगा भाई,
स्वयं ष्रेस्ठ है मानव फिर क्यों
पशुओं की जाए बलि चढाई।।
अपने स्वार्थ की सिद्धि करने
करते देखो भगवान को बदनाम
स्वयं को ष्रेस्ठ बताते फिर भी
सबसे बरे करते हैं काम
जान, बेजुवान पशु की लेकर
देखो लेते सुख की साँस
दानव भोजन कहलाए ये सब
मदिरा और माँस ।।
सर्वष्रेस्ठ है मानव, तो फिर क्यों न
बलि मानव की चढाई जाए
ज्यादा खुश तव होगा देवता
अन्त में "सुशील" बतलाए।।

सुशील कुमार "पटियाल"

अपने ना बेगाने

कौन तेरा है अपना प्यारे
हुआ कौन बेगाना
अपने ही हैं सारे जहाँ में
क्यों नहीं तूने पहचाना
जाने सबकुछ मानव फिर भी
है मानो अनजाना
जाने कब तक जुर्म करेगा
कैसे पड़ेगा उसे समझाना
देश में दहशत फैलाने वालों
क्यों चाहते हो दंगे करवाना
सभी तुम्हारे अपने हैं फिर
कैसे पड़ेगा तुझे समझाना
देश के दरिंदों सुन लो
चाहता हूँ मैं तुम्हें बतलाना
ये देश तुम्हारा अपना है
क्यों चाहते हो इसे नुकसान पहुँचाना

ऐ देश के नौजवानों
सहज न किसी की बात में आना
देश को ऊँचा उठाने को
पड़ेगा तुझे अभियान चलाना
अपने सभी हैं यहाँ पे प्यारे
पर नज़रिया तेरा बेगाना है
नज़र उठा के देख ज़रा
ये देश ही तेरा ठिकाना है
छोटा बड़ा अपना प्यारे
सबको गले लगाना सीख
गले लगा ले उसको भी तू
कहे सुशील जो माँगे भीख
सुशील कुमार पटियाल

चाहत ही चाहत

चाहत ही चाहत हो चारों ओर
मिट जाए ये घटा घनघोर
वन में नाचें फिर से मोर
हो मोहब्बत की ऐसी डोर
मोहब्बत की नदिया हो गहरा हो पानी
न मोहब्बत हो झूठी हो सच्ची कहानी
झूठे बंधन हैं सब यहाँ पे
ख़त्म करो अजी उनका शोर
चाहत ही चाहत हो चारों ओर

बसंत का मौसम हो
हो फूलों पे जवानी
न गमों की रात हो
हो रुत सुहानी
चाहत की चाँदनी हो चारों ओर
न मोहब्बत पे हो किसी का ज़ोर
चाहत ही चाहत हो चारों ओर

सुशील कुमार पटियाल

भक्त और भगवान

भक्तों के भगवान हैं
कहो राम या श्याम
प्रभू भी छुप नहीं पाते हैं
हो सच्चा यदि भक्त का ध्यान।।
राम भक्त हनुमान थे
उन में बसे थे राम,
देखो ध्यान लगा के तुम
बिगडे बनेंगे काम
सच्चे मन से जो प्रभू को पुकारे
पाते हैं वो सच्चे नजारे
तुम भी ध्यान लगा के देखो
मिलेंगे एक दिन प्रभू प्यारे।।
भगवान एक ही है प्यारे पर
कई हैं उसके नाम,
कोई उसे अल्हा कहे
तो कोई वाहे-गुरू, सियाराम।।
हम तो हैं आकार धनुष के
चढाते हैं प्रभू उस पे कमान
सच्चे की वो रक्षा करते
मारे जाते हैं बईमान।।
पर आज के युग में कठोर साधना
कौन करता है भाई ?
कठोर साधना में लीन हो गए
तो कैसे होगी कमाई ?
कठिन साधना की ज़रूरत नहीं है
हो सच्चा यदि भक्त का ध्यान
हर वक्त तुम्हें याद रखना है
बस उस प्रभू का नाम।।

सुशील कुमार पटियाल

पैसे की शान

हर शान बनी है पैसे से
हैं बने पैसे के इंसान
नहीं मूल्य कोई इंसानियत का है
ज़रा देख ले तू भी भगवान

सच्चे का सिर नीचा है
है ऊँचा उठ रहा बेईमान
काम करे जो सारा दिन
हुक्म चलाए उस पे धनवान

चार कदम जो पैदल चलते
घिस जाते हैं उनके पाँव
काम करके पेट जो भरते
एक गाँव से दूसरे गाँव

धन बना अब सच्चा ईमान
देख ले आके अब तू भी भगवान
याद गरीब तुझे रखता है
पर भूल गया अब है धनवान

तन को ज़रा कष्ट न पहुँचे
सोच रहा मूर्ख नादान
जीवन का फिर मज़ा क्या लिया
किया नहीं जिसने कोई काम

चिर स्थाई समझ बैठा खुदको
भूल गया है वो समसान
मन का मनका नहीं फेरते
प्रभु का करते मुख से गुणगान

गहरा भाव है छुपा यहाँ पे
समझे जो कोई हो इंसान
मानव वही है यारो
हो वो निर्धन या हो धनवान


सुशील कुमार पटियाल

हिन्दी का भविष्य

आज मुझे हिन्दी का भविष्य अंधकार में खोता हुआ नज़र आ रहा है। अन्ग्रेजी ने हिन्दी को कहीं दबा के रख दिया है। आज हालात ये हैं कि जो हिन्दी बोलता है उसे निम्न दर्जे का माना जाता है। मुझे तो यह कहते हुए शर्म आती है कि हम लोगों ने भारतीय सभ्यता को दरकिनार करके पाश्चात्य सभ्यता को गले लगा लिया हैं । शहरों कि सर्वाधिक आवादी अन्ग्रेजी बोलना ही पसंद करती है । आखिर ऐसा क्यों हो रहा है?
इस का केवल एक उत्तर है - भारत में विदेशी कंपनियों का बढता कारोबार । मगर मैं उन लोगों से जो हिन्दुस्तानी तहजी़व को भुला चुके है, यह कहना चाहुंगा कि अगर पश्चिम का नंगा नाच ही अच्छा लगता है तो वहीं जा कर क्यों नहीं बस जाते । कम से कम भारतीय संस्कृति को तो खराब मत करो ।
मै। विकास का वरोधी नहीं हूं मगर क्या विकास भारतियता में रह कर नहीं किया जा सकता । शायद पाश्चात्य रंग में रंगने वाले लोग यह सोचते होंगे कि नंग-धडंगे रहना और उल - जलूल कपडे पहनना ही देश का विकास है। कितनी शर्म की बात है। मैंने ऐसे कई लोग देखे हैं जो अपनी भाषा में कम और विदेशी भाषा में बात करना ज्यादा पसंद करते है । हलांकि आज हिन्दी का अस्तित्व भौगौलिक हो रहा है विदेशी यहां आ कर हिन्दी सीख रहे हैं ताकि वे हिन्दी भाषियों से हिन्दी में बात कर सकें । मैं उन भारतियों से पूछना चाहुंगा जो विदेशों में जाकर बस गए हैं कि क्या उन्होंने कभी किसी विदेशी को उसके देश में हिन्दी या कोई अन्य भाषा बोलते सुना है। शायद नहीं सुना होगा । आखिर वे क्यों किसी दूसरी भाषा का प्रयोग नहीं करते? मुझे लगता है के वे लोग सच्चे देशभक्त हैं और उन्हें अपने देश और सभ्यता में पूर्ण विस्वास है । हम भारतीय उनके अच्छे गुणों के बजाए अवगुणों को ज्यादा पसंद कर रहे हैं जो कि देश की एकता और अखन्डता, सभ्यता और संस्कृति को नष्ट करने का अचूक हथियार है। मैं ऐसे लोगों को देशद्रोही का नाम दूंगा । अन्ग्रेजी बोलना कोई बूरी बात नहीं है न ही कोई भाषा सीखने से मुझे कोई आपत्ति है । मगर इन भाषाओं का प्रयोग तब किया जाना चाहिए जब सामने वाला व्यक्ति आप की बात (हिन्दी में) न समझ सके।
मुझे अन्ग्रेजी बोलने में गर्व नहीं अपितु हिन्दी बोलने में गर्व महसुस होता है।
मैं ये भी जानता हूं कि मेरा ये सब लिखना व्यर्थ है क्योंकि अन्ग्रेजी पढने वाले हिन्दी पढना शायद पसंद नहीं करते।


सुशील कुमार पटियाल

बिमार प्रकृति

आज हुई प्रकृति मानव का शिकार
काटे जा रहे वन हो रहा व्यापार
जितनी फैली हैं बिमारियां,
है मानव उनका जिम्मेवार ।।
खेल रहा मानव प्रकृति से
किसने दिया उसे यह अधिकार
आज मानव कर प्रकृति पर,
देखो कितने अत्याचार ।।
ये झूठ नहीं है प्यारे
डूबेगा एक दिन संसार,
लाखों गैलन गंदा पानी
निकल रहा जो धूँआधार ।।
जनसंख्या ज्यों - ज्यों बढ रही
दिन प्रतिदिन लाखों हजार,
माने मानव अपनी जीत प्रकृति पर
मानो लेकर खडा हो ढाल - तलवार ।।
लेकिन लेगी प्रकृति बदला
छोडो करना बुरा व्यव्हार,
वनों को काटने की सोच न मानव
प्रकृति कि सुन्दरता पर करो विचार ।।

सुशील कुमार पटियाल

सोमवार, 28 जुलाई 2008

होली के रंग

आओ खेलें होली के रंग
मिलके खेलें सब संग - संग
सीमा, रेखा, चुन्नू - मुन्नू
सब खेलेंगे होली आज
जो देखे रह जाए दंग ।।
काला, नीला, पीला
कोई दिखे गुलाबी
फ़िजा हुई है सारी रंगीली
लगता है हर कोई शराबी ।।
होलियारों का टोला आया
नए नवेले लेके रंग
मिलके खेलें आओ होली
मिलके खेलें सब संग - संग ।।
रंगो की ज्यों बहार है आई
रंगो की ज्यों बदली छाई
हर चीज़ है रंगों में नहाई
दूर दुश्मनी हो जाती है
मिलते हैं गले भाई - भाई ।।
भाईचारा प्यार बढाए
ऐसी होली हम खेलेंगे
खुशियाँ बाँटे सब मिलकर अब
चलो दुख दर्द ज़माने के ले लें
चलो मिलके रोकें रक्त की जंग
आओ खेलें होली के रंग
मिलके खेलें सब संग - संग ।।


सुशील कुमार पटियाल

सोच

हम भी थे सोच में
वो भी थे सोच में
बस फिर हुआ यूं
कि सोचते - सोचते ही
सोच बदल गई
सोच भी कुछ ऐसी बदली कि
शायद न आएं कभी होश में ।।

काश ! मैं भी ...

काश ! मैं भी एक फौजी होता
जगता, रातों को न सोता
देख के देश का दुश्मन मेरा
सर पकड - पकड कर रोता
काश मैं भी एक फौजी होता ।।
हिन्दोस्ताँ की धरती पे
पाँव न उनको धरने देता
जान जाए तो जाए मगर
न पीठ दिखाता भारत का बेटा ।।
संजय, बत्तरा बन जाता मैं
दुश्मन को खतरा बन जाता मैं
सीने पे गोली लगे भले ही
पीठ पे गोली कभी न खाता मैं ।।
देश भक्ति का जोश है मुझ में
रे दुश्मन न होश है तुझ में
क्यों खुद को काँटे यूं है बोता
काश ! मैं भी एक फौजी होता ।।


सुशील कुमार पटियाल

गंगा मैय्या कहती है........

आज देश के हर गली में
हर कूचे में -
स्वार्थ की गंगा बहती है
गंगा को भी अपवित्र कर दिया
स्वयँ गंगा मैय्या कहती है ।।
देश की गंदगी का भार
गंगा मैय्या सहती है
ये मैं नहीं -
स्वयँ गंगा मैय्या कहती है ।।
पवित्र होने न जाने
कितने यहाँ पे आते हैं
स्वयँ पवित्र होते हैं पर
तट पे गंदगी फैला जाते हैं ।।
देश के हर कोने से
कई नदियां बहती हैं
ये मैं नहीं -
स्वयँ गंगा मैय्या कहती है ।।
गंदगी दूर हटाओ यारो
है यदि शुद्ध मन से जीना
अमृत जल न रहेगा फिर ये
पडेगा तुमको ज़हरये पीना ।।
जाने सब कुछ मानव फिर भी
हर तट पे गंदगी रहती है
ये मैं नहीं...........ये मैं नहीं
स्वयँ गंगा मैय्या कहती है ।।


सुशील कुमार पटियाल

न तेरा भरोसा

न प्राणी तेरा भरोसा है
ये जिन्दगी भी बस एक धोखा है
क्यों तू नाज़ करे यूं झूठा
पल भर का ये झोंका है ।।
नए ख्वाव सजाए सब ने
कल के लिए कुछ सोचा है
ये जिन्दगी बस पल भर का एक धोखा है ।।
हर दिल के अरमान है अपने
चाहे बडा है या छोटा है
टूट गए अरमान जो तेरे
प्यारे काहे तू रोता है
ये जिन्दगी भी बस एक धोखा है ।।
जाने कितने तारे टूटे,
न गगन कभी भी रोता है
मधुवन के कई फूल मुरझाए,
न असर उस पे कभी होता है
दुनिया के गम देख तू प्यारे
तेरा गम बडा छोटा है
ये जिन्दगी भी बस एक धोखा है ।।
साँसों पर है खुदा का पहरा
जाने हर ले कब जान तरी ये
जब प्यारे तू सोता है
क्यों झूठी तस्सली दिए है दिल को
यहाँ कौन किसी का होता है
ये जिन्दगी भी बस एक धोखा है ।।
माँ-बाप और भाई-बहन
सब रिस्तों का सिक्का खोटा है
न साथ तेरे कुछ जाएगा प्यारे
हर कोई यहीं पाता है, यहीं खोता है
ये जिन्दगी भी एक धोखा है ।।

सुशील कुमार पटियाल

कैसी शिक्षा !

ये कैसी शिक्षा है रे भइया
लाखों खर्चा लगे रुपैया
दर - दर ठोकर फिर भी खाते
ये कैसी शिक्षा दईया रे दईया ।।
कोई बी ए करे कोई बी एस सी
कोई एम करे कोई एम एस सी
कोई बी एड करे कोई एम एड भी
दर - दर ठोकर फिर भी खाते
भला पार लगे कैसे ये नैय्या ।।
पैसे से कोई कैप्टन बनते
पैसे से कोई डी सी
पैसे से अरे बिकती शिक्षा
पैसे से कोई ले ले पी सी
बिन पैसे न शिक्षा मिलती
बैठ के गाते राम रमैय्या
ये कैसी शिक्षा है रे भइया
लाखों खर्चा लगे रुपैया ।।


सुशील कुमार पटियाल

जग जा तू

मुर्गा करता कुक - डूं - कूं
भोर हुई अब जग जा तू
बच्चे बोले, अरे सोने दे
हमें सपनों में खोने दे
शोर मचाता है तू क्यों ?
चिडिया गाती चीं - चीं - चीं
खुशियों से जी भर लो जी
बच्चे बोले चुप हो जा
सोने दे हमें जा - जा - जा
मुर्गा तो शोर मचाता ही है
बाज़ न आए क्यों तू भी ?
कउआ बोला कांएं - कांए
सोया पडा है हाय - हाय
अब तकदीर तुम्हारी सो जाएगी
कर देगी तुम्हें बाय- बाय
बच्चे बोले न - न - न
भैय्या ऐसा करना न
ताजा तन और मन पाऐंगे
बस माफ़ हमें तू कर दे न ।।
तोता बोला टाएं - टांए
चलो अपने - अपने काम पे जाएं
जग के जल्दी सुबह सवेरे
ताजा तन और मन पाएं
स्कूल में पढना A B C
बात जो मेरे साथी बतलाएं
चलना इन पे न टलना जी ।।


सुशील कुमार पटियाल

शुक्रवार, 25 जुलाई 2008

रिश्ते

अब नाम के रिश्ते रह गए
जो बचे थे वो काम के रिश्ते रह गए
सब दाम के रिश्ते रह गए
अब बदनाम ये रिश्ते रह गए ।।


सुशील कुमार पटियाल

सपने

हमने देखे थे कुछ सपने
वो सपने जो टूट गए
सब अपने हम से रूठ गए ।।


सुशील कुमार पटियाल

घर

दूर गगन की छाँव में
एक छोटे से गाँव में
अपना भी एक घर है


सुशील कुमार पटियाल

ठिकाना

न मंजिल मिली
न मिला ठिकाना
न ताल मिली
न बना कोई गाना
न मंजिल मिली
न मिला ठिकाना


सुशील कुमार पटियाल

सभ्य हो जाए

सोचो कुछ ऐसा
कुछ भव्य हो जाए
ये हमारा समाज
कुछ और सभ्य हो जाए ।।


सुशील कुमार पटियाल

नेता और अभिनेता

नेता और अभिनेता
दोनों एक समान
एक दिखता है पर्दे पे
एक दिखता है खुलेआम


सुशील कुमार पटियाल

जाहिल गंवार

जाहिल गंवार होके निकले
करके कितने कालेज कि पढाई
प्यार मुहब्बत दूर रह गई
गले लगा ली नफरत और लडाई ।।


सुशील कुमार पटियाल

डुलती नाव

चुनाव कि नाव
खाए हिचकोले
कोई कांग्रेस,
कोई भाजपा बोले


सुशील कुमार पटियाल

नन्हीं गुडिया

छोटी नन्हीं सी गुडिया
बचपन में बनती बुढिया
हाथ में डण्डा लेकर चलती
कभी बोल राम राम, हाय ठण्ड है कितनी
आग के आगे हाथ है मलती ।।
दादी माँ कि नकल उतारे
मम्मी - पापा और देखें सारे
कमर झुकाए देखो चलती
बचपन में मानो उम्र है ढलती ।।
लेके गोदी में कभी पत्थर
माँ के जैसे है सहलाती
कभी बनाए मिट्टी कि रोटी
वो नन्ही गुडिया छोटी छोटी ।।
डांटे कोई तो झट रो देती
उछल कुद करे सारा दिन
थक हार के फिर सो जाती ।।

सुशील कुमार पटियाल

जल बिन

जल बिन जग न पाएगा
जल बिन जल जाएगा
आग लगेगी तन में तेरे
बिन जल कैसे बुझाएगा ।।
बहाओ न यूं व्यर्थ मे जल
दुषित करो न उस नदिया को
बहती है जो कल - कल, कल - कल
बंजर भूमि बन जाएगी
कमल खिलेंगे कहां कभी फिर
बिन दल दल, बिन दल दल ।।
प्राण पखेरू उड जाएंगे
बिन जल (गंगा) न ही मुक्ती मिलेगी
जब आत्मा तेरी पुकार करेगी
तब जल की कमी बहुत खलेगी ।।
जल बिन जीवन न मिल पाएगा
तन मन धन सब छल जाएगा
आओ बचा लें बूंद - बूंद जल
न सूखे कूंए न सूखे नल
हम तो नहीं हैं चिर के खातिर
किसी और को जीवन मिल जाएगा ।।

सुशील कुमार पटियाल

आओ लोटा दें

आओ अपना मन बना लें
हंस लें थोडा - थोडा गा लें
छा जाएं इस जहां में फिर से
लिया जहां से जो अब तक था
आओ उसे वापिस लौटा दें ।।
रोने धोने से कुछ न होगा
करोगे कुछ तो कुछ तो होगा
पतझडती इस बगिया को
वापिस इस की बहार लौटा दें ।।
सबकी सुनते आए हो
कभी मन के मनके गिन लो न
घाव ये दिल के छितर न जाऐं
पक्के धागे से इन्हें सिल तो न
बिखरी हुई इस माला को
वापिस इस के मनके लौटा दें
आओ अपना मन मना लें
हंस लें थोडा - थोडा गा लें।।

सुशील कुमार पटियाल

अन्तर

अधिकारी और भिखारी में
बोलिए क्या है अन्तर
एक तो मांगे वैठा सडक पर
एक मांगे दफ़तर के अन्दर ।।

सुशील कुमार पटियाल

Thanks for loving me

Thanks for loving me

Bye bye dear

Bye bye dear