शुक्रवार, 17 नवंबर 2017

मिट्टी का हूं

मिट्टी का हूं-
मिट्टी में मिल जाऊंगा
अकेले जग में आया था
अकेले ही चला जाऊंगा
मिट्टी का हूं-
मिट्टी में मिल जाऊंगा !!

न जिस्म जवान रहेगा सदा
न नजाकत ऐसी रहेगी
न ऐसी रहेगी अदा !!

तुम भी बात मेरी यह मान लो
तुम भी नश्वर हो
जीवन का सच जान लो !!

अब तक ऐसा क्या पाया है
कि आगे कुछ पा जाऊंगा
मिट्टी का हूं
मिट्टी में मिल जाऊंगा !!

ये गर्व तेरा गर्त में ले जाएगा
क्या खोया और क्या पाया है
फिर इसका हिसाब लगाएगा !!

जिस्म से जान जुदा होनी है
इस देश से थोड़ा काम लो
साथ नहीं कुछ जाना है
बात गांठ बांध लो !!

जब तक प्रेम से जीवन चले
तब तक इसे चलाऊंगा
मिट्टी का हूं-
मिट्टी में मिल जाऊंगा
अकेला जग में आया था
अकेला ही चला जाऊंगा !!

सुशील कुमार पटियाल
दिनांक: 17-11-2017

बुधवार, 19 अप्रैल 2017

खुद की पहचान

तुम खुद ही खुद के शत्रु हो
और खुद ही खुद के साथी हो
जब बात समझ ये आ जाती है
तब दुनिया सारी भा जाती है ॥

फिर अपना किसी को नहीं कहते हो
और कोई पराया नहीं लगता है
जब जनमानस सोता रहता है
तब अंत्रमन तेरा जगता है ॥

जब अपना पराया भूल जाते हो
जब खुद को ही तुम धूल पाते हो
तब भेदभाव सब भूल जाता है
तब न कोई शत्रु होता है
न साथी कोई रह जाता है ॥

सुशील कुमार पटियाल
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दिनांक: 16-04-2017

बुधवार, 22 फ़रवरी 2017

उजाले ढूंढते हैं

रातों को जग-जग कर
दिन के उजाले ढूंढते हैं
खुद को खोज नहीं पाते
सब मारे-मारे घूमते हैं
रातों को जग-जग कर
दिन के उजाले ढूंढते हैं।।

जब तक है जवानी, जंग जारी है
जिंदगी की यह दूसरी पारी है
जाने कब खेल खत्म हो जाना है
पर लगता है जैसे जिंदगी अभी सारी है।।

नियम नियति के तोड़कर
बनावटी पुष्पों से सुगंध सूंघते हैं
रातों को जग-जग कर
दिन के उजाले ढूंढते हैं ।।

सुशील कुमार पटियाल
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शुक्रवार, 17 फ़रवरी 2017

सारे सहारे खो जायेंगे

एक दिन आंखों से उजाले ओझल हो जाएंगे
जिनको जीवन भर चाहा, वो सारे सहारे खो जायेंगे
हाथ तेरे न फिर कुछ भी होगा, सबसे किनारे हो जाएंगे
कहां रहा कोई साथ सदा, सब खुदा के प्यारे हो जाएंगे ॥

नफरत से न नाता जोड़ो, ये फूल अंगारे हो जाएंगे
प्रेम बिना यहां पल भी भारी, बिन प्रेम नकारे हो जाएंगे
तेरे आंसू की यहां कीमत क्या है, केवल दर्द तुम्हारे हो जाएंगे
प्रेम की भाषा पंछी भी जानें, इक दिन सपनों में सब खो जाएंगे ॥

खोज खबर अब खुद की भी ले ले, सदा नहीं जीवन के मेले
खोजोगे जो खुद के भीतर, उस दिन अंदर उजाले हो जाएंगे
खाली रहेगा पड़ा जिस्म ये, उस दिन लोगों के अंदाज निराले हो जाएंगे
ख़बर तेरी फिर किसको होगी, सब खास तुम्हारे खो जाएंगे ॥

एक दिन आंखों से उजाले ओझल हो जाएंगे
जिनको जीवन भर चाहा, वो सारे सहारे खो जायेंगे ॥

सुशील कुमार पटियाल

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सोमवार, 13 फ़रवरी 2017

हर ओर तुम्हारी चर्चा

हर ओर तुम्हारी चर्चा
हर और तुम्हारी बातें
तेरी सोच में बीत रहे थे दिन
कट सी रही थी रातें
तेरे भोलेपन की हम मिशाल दिया करते थे
पर न जाने अब क्यों सूख रही हैं सांसे
हर ओर तुम्हारी चर्चा
हर और तुम्हारी बातें ॥

हमने जो भी गाए हैं
गज़लें, गीत, अफ़साने
छोड़ उन्हें अब, न सुन उनको
यूं ही रोते रहे कवि है
यूं ही गाते रहे दीवाने
हम चांद की चंचलता न समझे
यहां कहां है कोई अपना
जाने मन क्यों तुम्हें अपना माने ॥

हम दिल के दर्द से दुखी बहुत हैं
पर दर्द भला यह किस से बांटें
क्या क्या कहते हैं लोग यहां
हम किस किस को रोकें
और किस किस को डांटें ॥

तुम हंस कर काट रही हो वक़्त यहां
समझ न आए हम कैसे काटें
हर ओर तुम्हारी चर्चा
हर और तुम्हारी बातें ॥

सुशील कुमार पटियाल
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मन को बलवान करो

तन की ताकत को न तोलो
पहले मन को बलवान करो
तन की ताकत पे तन न इतना
इतना न अभिमान करो ॥

ताकत तरु के पास बहुत है
तुम हो गौण वह ख़ास बहुत है
तुम तो खुद से ही दूर बहुत हो
वो बोले न पर ख़ास बहुत है ॥

समय साधता है हम सबको
कभी करो बुरा न, उस रब से डरो
वक्त से बड़ा बलवान न कोई
तो आओ सबका सम्मान करो

तन की ताकत को न तोलो
पहले मन को बलवान करो ॥

सुशील कुमार पटियाल
© Copyright

न चिन्ता हो

न भूत की चिन्ता
न भविष्य की चिन्ता
न चिन्ता हो वर्तमान की
सब कुछ तुम ही तो करते हो कृष्ण
बस ध्यान रहे यह बात ज्ञान की
न भूत की चिन्ता
न भविष्य की चिन्ता
न चिन्ता हो वर्तमान की ॥

इन अंखियों में बस तुम बस जाओ
इस धोखे वाली दुनिया से
अपना यह नाता तोड़ दिया
अब तुम ही एक सहारा हो
अब तुम ही मेरे प्यारे हो
तुम से ही प्रीत बंद हे मेरी
दूर रहे हर बात अज्ञान की
न भूत की चिन्ता
न भविष्य की चिन्ता
न चिन्ता हो वर्तमान की ॥

सुशील कुमार पटियाल
© Copyright

शुक्रवार, 10 फ़रवरी 2017

तख्त बदल गए

तख्त बदल गए, ताज बदल गए
जीने के अंदाज़ बदल गए
सुर तो अब भी सात हैं लेकिन
बस गाने के अंदाज़ बदल गए ॥

सुशील कुमार पटियाल © कॉपीराइट

रविवार, 5 फ़रवरी 2017

हूँ बेहोश मैं

तुम बस गई हो मेरी सोच में
दिखता हूं होश में मगर
अक्सर रहता हूँ बेहोश मैं
चलते-चलते थम से जाते हैं कदम
खुशियां मिलती नहीं, ठहर जाते हैं गम
छलक न जाएं आंखें अब ये
भर लो अपनी आगोश में
तुम बस गई हो मेरी सोच में
दिखता हूं होश में मगर
अक्सर रहता हूँ बेहोश में ॥
कभी दम भरते हैं कि कह दें, बात दिल की तुम से
मगर जब आती हो सामने, होश हो जाते हैं गुम से
जब दिल की बातें दिल में ही रह जाती हैं
नज़रें तुम पे और बस तुम पे ठहर जाती हैं
जव चलो जाती हो बिन बात किए
जाने रहती है क्यों तुम रोष में
तुम बस गई हो मेरी सोच में
दिखता हूं होश में मगर
अक्सर रहता हूँ बेहोश में ॥

© Copyright सुशील कुमार पटियाल
05-02-2017  7:23 pm

शनिवार, 4 फ़रवरी 2017

जिए जा रहे हैं

बस जिए जा रहे हैं
क्या खोया और क्या पाया है
ये हिसाब किए जा रहे हैं
रोज एक दिन आता है
एक रात चली जाती है
दिए बुझते हैं, बाती सुलग जाती है
खुद से खुद ही खफा रहने लगे हैं
थोड़ा सेहत का भी करो
लोग यह हम से कहने लगे हैं
हर बार जख्म गहरे जाते हैं
पर सिलने की, नाकाम सी कोशिश किए जा रहे हैं
बस जिए जा रहे हैं
क्या खोया और क्या पाया है
ये हिसाब किए जा रहे हैं ॥

धन हो पास तुम्हारे
तो मित्र कई मिल जाते हैं
बन जाते हैं कई सहारे
मगर हम तो वह भी पा न पाए
दिल के तराने कहां किसको सुनाएं
सब तो अपने मन की किए जा रहे हैं
जिंदगी जैसे ज़हर बन गई
और वही जहर पीए जा रहे हैं
बस जिए जा रहे हैं
क्या खोया और क्या पाया है
ये हिसाब किए जा रहे हैं ... ॥

सुशील कुमार पटियाल
© Copyright
O4-02-2017  O7:.21 PM

गुरुवार, 2 फ़रवरी 2017

कैसा झगड़ा कैसी लड़ाई

कितने साल चले गए
लटक गई खाल बाल चले गए ॥
आंखें भी अब जवाब दे गईं
बीते दिनों के ख्वाब दे गईं ॥
कान कहां अब सुनते हैं
अब मन की बातें बुनते हैं ॥
फिर भी अभिमान नहीं जाता
नया चेहरा पाने की कोशिश करता
खुद को नया - नया दिखलता ॥
सच को साकार करो ऐ भाई
न शेखी बघारो न करो बढ़ाई
सब जाना है सब छोड़ छाड़ के
फिर कैसा झगड़ा, कैसी लड़ाई ॥

सुशील कुमार पटियाल
© copyright

बुधवार, 1 फ़रवरी 2017

जीवन के दिन चार

प्यार में गुजार दे, ये जीवन के दिन चार है
प्रेम नहीं यह जानता कहां कोठी बंगला कार है
सब कुछ सहता है वह इंसान
जिसके सर पर प्यार सवार है
प्यार में गुजार दे कि जीवन के दिन चार है ॥

रोष में न कभी होश रहता है
यह पागल कवि, वो दीवाना कहता है
रूठ के रहना, न कुछ भी कहना
बिन तेरे, मेरा नीरस ये संसार है
प्यार में गुजार दे, ये जीवन के दिन चार है ॥

सदा के लिए नहीं हैं सांसें
वक्त कहां किस किस को जांचे हैं
यह जीवन भी तो नहीं है अपना
यह सांसें भी तो उधार हैं
प्यार में गुजार दे, ये जीवन के दिन चार है ॥

 Sushil Kumar Patial
© Copyright
31-01-2017
5:00 AM

रविवार, 8 जनवरी 2017

पल-पल पाप कमाता है

कल का पता नहीं है पगले
क्यों पल-पल पाप कमाता है
पल पल तेरा पतन हो रहा
क्यों ना कोई तुझे समझाता है ॥

सत्य रहेगा सदा सनातन
रुह है अपनी अमर पुरातन
देह यहीं पे दान किए जा
न संग चलेगा तन और धन ॥

संग लाया था क्या -
जो खोने का डर सताता है
जैसा बीज बीजता धरा में
फल वैसा ही पता है ॥

पाप का बोझ बढ़ाने में
कुछ तेरा भी हिस्सा है
तू अकेला नहीं जगत में
ये तो हर इंसान का किस्सा है॥

माना तू बलवान बहुत है
पर क्यों बलहीन को सताता है
पापों की ये पोटली लेकर
क्यों पापी कहलाता है ॥

कल का पता नहीं है पगले
क्यों पल-पल पाप कमाता है ॥

© Copyright
सुशील कुमार पटियाल
दिनांक: 01-08-2016
समय: 07:07 AM


शुक्रवार, 30 दिसंबर 2016

एक दिन तुमको पाएंगे

तुमको चाहा है हमने और एक दिन तुमको पाएंगे
इस जन्म नहीं सौ जन्म सही, इक दिन प्यार निभाएंगे
और नहीं अब चाहत कोई तेरी चाह में मरते जाएंगे
तुमको चाहा है हमने और एक दिन तुमको पाएंगे ॥

तुम तड़पाओ अब जितना, भले न हम से बात करो
पर प्रेम मेरा ये सच्चा है इसका न उपहास करो
तेरे चाहने वाले हजारों, कभी हमको भी तो याद करो
तुम तड़पाओ अब जितना, भले न हम से बात करो ॥

तुम मुस्कुरा के देख लो बस, इतना तो एहसान करो
माना तुम हो किरण चांद की, पर इतना ना अभिमान करो
हमने तुमको पल - पल चाहा, हर पल तुम तुमको चाहेंगे
तुम न निभाओ कोई बात नहीं, पर हम तो सदा  निभाएंगे!!
© copyright
सुशील कुमार पटियाल
दिनांक: 30-12-2016
समय: 5 AM

सोमवार, 26 दिसंबर 2016

बस्ती बस्ती घोर उदासी

बस्ती बस्ती घोर उदासी पर्वत पर्वत खालीपन
मन हीरा बेमोल बिक गया घिस घिस रीता तन चंदन
इस धरती से उस अम्बर तक दो ही चीज़ गज़ब की है
एक तो तेरा भोलापन है एक मेरा दीवानापन
जिसकी धुन पर दुनिया नाचे, दिल एक ऐसा इकतारा है
जो हमको भी प्यारा है और, जो तुमको भी प्यारा है
झूम रही है सारी दुनिया, जबकि हमारे गीतों पर
तब कहती हो प्यार हुआ है, क्या अहसान तुम्हारा है
जो धरती से अम्बर जोड़े, उसका नाम मोहब्बत है
जो शीशे से पत्थर तोड़े, उसका नाम मोहब्बत है
कतरा कतरा सागर तक तो,जाती है हर उमर मगर
बहता दरिया वापस मोड़े, उसका नाम मोहब्बत है
इस उड़ान पर अब शर्मिंदा, मैं भी हूँ और तू भी है
आसमान से गिरा परिंदा, मैं भी हूँ और तू भी है
छूट गयी रास्ते में जीने – मरने की सारी कसमें
अपने अपने हाल में जिंदा, मैं भी हूँ और तू भी है

साभार- डॉ कुमार विश्वास

पगली लड़की

अमावस  की  काली  रातों  में, जब दिल  का  दरवाजा  खुलता  है ,
जब  दर्द  की  प्याली  रातों  में,  गम  आंसूं के  संग  होते  हैं ,
जब  पिछवाड़े  के  कमरे  में , हम  निपट  अकेले  होते  हैं ,
जब  घड़ियाँ  टिक -टिक  चलती  हैं , सब  सोते  हैं , हम  रोते  हैं ,
जब  बार  बार  दोहराने  से  , सारी  यादें  चुक  जाती  हैं ,
जब  उंच -नीच  समझाने  में , माथे  की  नस  दुःख  जाती  हैं ,
तब  एक  पगली  लड़की  के  बिन  जीना  गद्दारी लगता  है ,
और  उस  पगली  लड़की  के  बिन  मरना  भी  भरी  लगता  है .


जब  पोथे    खाली  होते  हैं , जब  लोग सवाली  होते  हैं ,
जब  ग़ज़लें  रास  नहीं  आतीं , अफसाने  गाली  होते  हैं .
जब  बासी  फीकी  धुप  समेटें , दिन  जल्दी  ढल  जाता  है ,
जब  सूरज  का  लश्कर , छत  से  गलियों  में  देर  से  जाता  है ,
जब  जल्दी  घर  जाने  की  इच्छा , मन  ही  मन  घुट  जाती  है ,
जब  कॉलेज  से  घर  लाने  वाली , पहली  बस  छुट  जाती  है ,
जब  बेमन  से  खाना  खाने  पर , माँ   गुस्सा  हो  जाती  है ,
जब  लाख  मन  करने  पर  भी , पारो  पढने  आ  जाती  है ,
जब  अपना  हर  मनचाहा  काम   कोई  लाचारी  लगता  है ,
तब  एक  पगली  लड़की  के  बिन  जीना  गद्दारी  लगता   है ,
और  उस   पगली  लड़की  के  बिन  मरना  भी  भारी  लगता  है 


जब  कमरे  में  सन्नाटे  की  आवाज  सुनाई देती  है ,
जब  दर्पण  में  आँखों  के  नीचे  झाई  दिखाई  देती  है ,
जब  बड़की भाभी  कहती  हैं , कुछ  सेहत  का  भी  ध्यान  करो ,
क्या  लिखते  हो  दिनभर , कुछ  सपनों  का  भी  सम्मान  करो ,
जब  बाबा  वाली  बैठक  में  कुछ  रिश्ते  वाले  आते  हैं ,
जब  बाबा  हमें  बुलाते  हैं , हम  जाते  हैं , घबराते  हैं ,
जब  साड़ी  पहने  एक  लड़की  का,  एक  फोटो  लाया  जाता  है ,
जब  भाभी  हमें  मनाती  हैं , फोटो  दिखलाया  जाता  है ,
जब  सारे  घर  का   समझाना  हमको  फनकारी  लगता  है ,
तब  एक  पगली  लड़की  के  बिन  जीना  गद्दारी  लगता  है ,
और  उस  पगली  लड़की  के  बिन  मरना  भी  भारी  लगता  है 


दीदी  कहती  हैं  उस  पगली  लड़की  की   कुछ  औकात  नहीं ,
उसके  दिल  में  भैया  , तेरे  जैसे  प्यारे  जज्बात   नहीं ,
वो   पगली  लड़की  नौ  दिन  मेरे   लिए  भूखी   रहती  है ,
छुप  -छुप  सारे  व्रत  करती  है , पर  मुझसे  कभी  ना  कहती  है ,
जो  पगली  लड़की  कहती  है , मैं  प्यार  तुम्ही  से  करती  हूँ ,
लेकिन  मै  हूँ  मजबूर  बहुत , अम्मा -बाबा  से  डरती  हूँ ,
उस  पगली  लड़की  पर  अपना  कुछ  अधिकार  नहीं  बाबा ,
ये   कथा -कहानी   किस्से  हैं , कुछ  भी  तो  सार  नहीं  बाबा ,
बस  उस  पगली  लड़की  के  संग   जीना  फुलवारी  लगता  है ,
और  उस  पगली  लड़की  के   बिन  मरना  भी  भारी  लगता  है ॥

साभार- डॉ कुमार विश्वास

गुरुवार, 22 दिसंबर 2016

मिलन के इंतजार में

मौत से मिलन के इंतजार में
बैठा हूं कब से तैयार मैं
फिर प्रिय क्यों तुम आती नहीं
कुछ नहीं इस दिखावे के संसार में ॥

तुम्हें पाने को
गहरी नींद में तेरी बाहों में सो जाने को
अब दिल जैसे बेचैन सा है
अब विस्वास नहीं प्रेम-प्यार में
मौत से मिलन के इंतजार में
बैठा हूं कब से तैयार मैं

तुम ही तो इक सच्ची प्रेमिका
करती कोई भेद भाव नहीं
अब देर भला क्यों करती हो
क्या तुम को भी हमसे प्यार नहीं

अब बांध लो अपने पाश में
न मन लगता, स्वार्थ के संसार में
मौत से मिलन के इंतजार में
बैठा हूं कब से तैयार मैं ॥

© Copyright
सुशील कुमार पटियाल
दिनांक: 11-20-2016 12:20 AM

उजाला हो गया

घटा से निकल आया चांद
और उजाला हो गया
हम खो गए हैं तुझ में
और दिल का दिवाला हो गया ॥

कौन न चाहे चांद को पाना
सब चांद की चाहत रखते हैं
चंद भले हो सांसे फिर भी
चांद की चमक में फंसते हैं ॥

दोष हमारा न था सारा
न देखा तुझ सा मासूम
बस दिल ने तुझे पुकारा
आंख खुलते ही ख्वाव खो गया

घटा से निकल आया चांद
और उजाला हो गया ॥

© Copyright
 सुशील कुमार पटियाल
 दिनांक: 22-12-2016
समय : 4:33 AM

सोमवार, 19 दिसंबर 2016

My words!

My words could be stern
But my heart is mild
I say what I feel
It is crystal like a child.

I never meant to hurt
I never ever flirt
Please accept my apologies
At least write two words;
- Apology accepted
That'll ease my heart.

My smiles hide agony
But my appearance tells the.
 truth
I know, you know
What I think and how does it look
No one listened, when I cried
But my heart is crystal like a child

How can you be so tough
How can you be so stern
I could not understand
I could not learn
May love prevail in your heart!
Don't consider it like dirt
I never meant to hurt ..

© Sushil Kumar Patial

What is it?

Why I think of you all the time!
I know you can't be mine
But I still wish to see myself in your list
I hope this is not a kind of crime

I am ardent enough
To confess the mistakes
But you are still stern
Put my life on stakes

You are the Venus
The goddess of love
Mercy is your propensity
Just forgive the cub.

I don't have other mean express
Just help me to come out of stress
I need nothing but your smile
How the feelings can be suppressed

© Sushil Kumar Patial

शुक्रवार, 9 दिसंबर 2016

हम तरसते हैं

तेरी मुस्कराहटों की झलक पाने को हम तरसते हैं
हम तो पड़े रहे सहरा में प्यासे,
तेरे प्यार के बादल कहीं और जा के बरसते हैं॥

ऐसे देखते हैं तेरी ओर चोरी-चोरी,चुपके-चुपके
कि कहीं नज़रें ये मिल न जायें
कभी चाहते हैं कि गुफ्तगू हो आँखों ही आँखों में
कि नज़रे मिल ही जायें, बस नज़रें ये मिल ही जायें ॥

© Copyright  सुशील कुमार पटियाल
दिनांक: 09-12-2016
समय: 03:03PM

गुरुवार, 8 दिसंबर 2016

जानना हैं मुश्किल

किसी को जानना हैं मुश्किल
किसी को पहचानना है मुश्किल
ये मुश्किल भरा जहान है
खुद को ही मान बैठे हैं खुदा
मगर मुश्किल में खुद की जान है ॥

मोहब्बत के पैगाम को
भूल गए हैं अल्हा और राम को
रोज सजने लगी है महफिल यहां
मगर पहचान नहीं इंसाँ की इंसान को

किसी का प्यार पाना है मुश्किल
किसी का सार पाना है मुश्किल
ये मुश्किल भरा जहान है
खुद को समझे थे इंसान हम
मगर समझे नहीं, कि भीतर भी शैतान है ॥

वक़्त की इन लहरों पर
अपना अक्ष तक न खोज पाते हैं
बस ख्यालों में और ख्वाबों में
हर पर खोये से जाते हैं

किसी को तुफान लगते हैं मुश्किल
किसी को इंसां लगते हैं मुश्किल
ये मुश्किल भरा जहान है
इंसान बनना है कितना मुश्किल
इसी मुश्किल में सारा जहान है ॥

खुद को ही मान बैठे हैं खुदा
मगर मुश्किल में खुद की जान है ॥

© Copyright सुशील कुमार पाटियाल
दिनांक: 08-12-2016
समयः 7:51AM

सरल हूं, साफ हूं

ना कुदृष्टि है मेरी
न ही कुटिल मैं
सरल हूं, साफ हूं
न ही जटिल हूं मैं  ॥

तूने जाना कुटिल मुझे
पर हृदय से में पाक हूं
तुम ही हो कठोर हृदय
मैं तो धूल हूं, राख हूं ॥

काश मैं इतना सरल न होता
पत्थर सा होता कठोर ह्दय
द्रवित न होता, तरल न होता

कभी झुकाया न मस्तक मैंने
मगर तूने ये भी सिखा दिया
मिट्टी का हूं पुतला
मिट्टी में मिल जना है
इतना सब कुछ सिखा दिया ॥


© Copyright सुशील कुमार पाटियाल
दिनांक: 08-12-2016
समयः8: O4 AM

शनिवार, 26 नवंबर 2016

तुम से प्यार है!

सात दिन तो जैसे
सात जन्मों का इन्तजार है
कैसे कहूं मैं हे प्रिये
के हम को तुमसे प्यार है ॥

तुम्हें देखे तो वर्षों बीत गए
हम हारे तुम जीत गए
तू तो मेरे प्यार का संसार है
कैसे कहूं  मैं हे प्रिये
के हम को तुमसे प्यार है ॥

तू माने या न माने
प्रीत समझे या न जाने
दिल जलता है जैसे कोई अंगार है
कैसे कहूं मैं हे प्रिये
के हम को तुमसे प्यार है ॥

पल-पल पलकों पे भारी
न सोये अंखियां ये रैन सारी
तुम तरुणाई प्रेम की
तेरे सामने फीका श्रृंगार है
कैसे कहूं मैं हे प्रिये
के हम को तुमसे प्यार है ॥

© Copyright सुशील कुमार पटियाल
दिनांक: 26-11-2016 1:29PM

शुक्रवार, 25 नवंबर 2016

मेरी बातों में!

छुप-छुप के रोना
रात-रात भर न सोना
ये रोग भला है कौन सा
जो इन्सां था बातुनी बहुत
क्यों रहने लगा है मौन सा ॥

तुम ही तुम हो आंखों में
बस, बस गई हो जैसे सांसों में
साथ तेरा चाहे मिलाना मुश्किल
तुम रहोगी सदा मेरी बातों में ॥

तुम बिन जैसे पल पल भारी
जैसे सदियां बीत गई हो सारी
तेरी मुस्कान है जैसे,
कोई झोंका पवन की पौन सा
जो इन्सां था बातुनी बहुत
क्यों रहने लगा है मौन सा ॥

© Copyright
सुशील कुमार पटियाल
दिनांक: 25-11-2016 11:33AM

कोई बात नहीं

वो नज़रें मिलाना
नज़रें मिला के फिर ऐसे झुकाना
जैसे कोई बात नहीं
माना दूरियां हैं दिलों गहरी
मगर फिर भी तुम दिल में कहीं ॥

तुझ संग बैठ के
वक्त गुज़र जाए
कोई तो सुझाये
कुछ ऐसा उपाए

खड़े हैं तेरे इन्तज़ार में
बस वहीं के वहीं
वो नज़रें मिलाना
नज़रें मिला के फिर ऐसे झुकाना
जैसे कोई बात नहीं ॥

© Copyright
 सुशील कुमार पटियाल
दिनांक: 22-11-2016
समय : 6:44 AM

सोमवार, 21 नवंबर 2016

देह की गति

देह तेरी जलानी है
या फिर दफनानी है
नवनीत सी देह हो
चाहे वर्षों पुरानी है
बस इतनी सी तेरी कहानी है ॥

चाहे तू बड़ा ज्ञानी है
चाहे बड़ा अभिमानी है
चाहे अग्नि सा हो तेज तेरा
चाहे स्वभाव से बिलकुल पानी है
देह तेरी जलानी है
या फिर दफनानी है ॥

कुंद कलिक और केश सघन
बस रंग - रूप में रहे मगन
समझे अमिट ये जवानी है
पर नहीं पता है अगला पल
हो जानी देह बेगानी है
देह तेरी जलानी है
या फिर दफनानी है
बस इतनी सी तेरी कहानी है ॥

© Copyright सुशील कुमार पटियाल
दिनांक: 21-11-2016 6:49 AM

शुक्रवार, 18 नवंबर 2016

प्रतीक्षा तुम्हें पाने की

पुनर्जन्म की प्रतीक्षा में
पल-पल जीवन बीत रहा
इस जन्म में मेल है नहीं प्रिये
मिलते हैं आगे-
जो अन्त भला और ठीक रहा ॥

आस तुम्हें अब पाने की
कहां चाह रही अब ज़माने की
अब तू ही मन का मीत रहा
पुनर्जन्म की प्रतीक्षा में
पल-पल जीवन बीत रहा ॥

दिल दिमाग पे राज है तेरा
कुछ भी तो न अब यहां मेरा
अब बिन साज़ के ये संगीत रहा
पुनर्जन्म की प्रतीक्षा में
पल-पल जीवन बीत रहा ॥

कहना चाहा हाल- ऐ दिल
पर तुम यह समझ न पाई प्रिये
हम रहे बस प्रतीक्षा में
और तड़फ - तड़फ हम जिए

जब से तुम हो दूर गई
न मुहूर्त कोई अभिजीत रहा
पुनर्जन्म की प्रतीक्षा में
पल-पल जीवन बीत रहा ॥

© Copyright  सुशील कुमार पटियाल
दिनांक: 18-11-2016, 10:09 PM

छल के छलावे

छ्ल के इस छलावे में
क्या रखा है दुनिया के दिखावे में
आज लोग अ़क्ल से न जाने
विस्वास है बस पहनावे में ॥

मदमस्त हुआ यूं घूमें मानव
दिखने लगा अब हर कोई दानव
दर्द पराये से पीर कहां अब
सच्चा इन्सां धीर कहां अब
सब आ जाते बहलावे में

छ्ल के इस छलावे में
क्या रखा है दुनिया के दिखावे में ॥

यहां प्यार के बदले
तकरार मिलती है
सांसे भी अब तो उधार मिलती हैं
हर कोई जी रहा एक छलावे में
क्या रखा है दुनिया के दिखावे में ॥

© Copyright सुशील कुमार पटियाल

सोमवार, 14 नवंबर 2016

पल दो पल का साथ

चमक चांद की चन्न लम्हें
फिर अंधेरी रात है
जीवन यहां है पल दो पल का
बस पल दो पल का साथ है ॥

मांगा साथ न पैसा मांगा
फिर न जाने क्यों तू उदास है
किसी और की भला में क्या कहूं
बस मेरे लिए तू खास है ॥

भाव भला है मेरा सदा
पर मुश्किल में अब श्वास है
जीवन यहां है पल दो पल का
बस पल दो पल का साथ है ॥

पलकें एक दिन पलट जाएंगी
उस दिन सुंदर आंखें छलक जाएंगी
फिर रहना तुम्हें उदास है
तुम्हारे लिए मैं न सही
पर मेरे लिए तू खास है ॥

जीवन यहां है पल दो पल का
बस पल दो पल का साथ है
चमक चांद की चन्न लम्हें
फिर अंधेरी रात है॥

© Copyright सुशील कुमार पटियाल
दिनांक: 14-11-2016
Time:. 01:01 PM

सोमवार, 7 नवंबर 2016

वो राक्षस कहलाए

राक्षस सदा ही रक्त बहाए
दिल दुखाए,
दर्द किसी का समझ न आए
इसीलिए तो वो राक्षस कहलाए ॥

दुख में देखें दुनिया को तो
मन उन का मजे में मुस्कुराए
किसी माँ से बिछड़ा हो बच्चा
उस माँ का दिल कैसे न कहराए ॥

अभी खाते जाओ जानवर को
फिर इंसान की बारी है
किस ओर यह जगत है जा रहा
यह घोर अंत की तैयारी है ॥

मुस्लिम दफनाते हैं मुर्दा
और हिंदू देता उसे जलाए
राक्षस नहीं यह समझता
दिया उदर शमशान बनाए ॥

राक्षस सदा ही रक्त बहाए
दिल दुखाए,
दर्द किसी का समझ न आए
इसीलिए तो वो राक्षस कहलाए ॥

© Copyright सुशील कुमार पटियाल
 दिनांक: 07-11-2016 4:43 PM


शुक्रवार, 4 नवंबर 2016

तरक्की तूफानों की

माना तूफान तरक्की कर जाते हैं
मगर कितने डरते हैं तुफाँ से
और देखो कितने ही मर जाते हैं
माना तूफान तरक्की कर जाते हैं॥

लाशों के ढेर पर चढ़कर
जो खुद को महान बताते हैं
खुद खा जाते लाशों को
और जिंदा को दफनाते हैं
माना तूफान तरक्की कर जाते हैं॥

दूजे का जो दर्द ना जाने
वही तो दानव कहलाते हैं
अपना दर्द उन्हें बड़ा लगता है
दूजे पर हंसते जाते हैं
माना तूफान तरक्की कर जाते हैं॥

© Copyright
सुशील कुमार पटियाल

बुधवार, 2 नवंबर 2016

नसीब न होंगे

वह दिन दूर नहीं है अब
जब चार कंधे भी नसीब न होंगे
चाहने वाले तो खूब मिलेंगे
अपने फिर भी करीब ना होंगे
वह दिन दूर नहीं ह अब
चार कंधे भी नसीब ना होंगे ॥

स्वार्थ के संसार में
अब रिश्तो ने दम हैं तोड़ रहे
सुनते हैं अब बच्चे
बूढ़े मां-बाप को छोड़ रहे
आने वाले वक्त के लोग
देखना कितने अजीब होंगे
वह दिन दूर नहीं ह अब
चार कंधे भी नसीब ना होंगे ॥

अक्षर ज्ञान तो पा रहे
पर शिक्षा का अभाव रहा
छू जाएंगे चांद को
सब का मकसद खास रहा
मिलता नहीं वो चांद मगर
आगे लोग अब शरीफ न होंगे
वह दिन दूर नहीं ह अब
चार कंधे भी नसीब ना होंगे ॥

सुशील कुमार पाटियाल
2-11-2016 5:26 AM

ये कैसे जगत में

ये कैसे जगत में भेजा तूने
जहां हर जीव है अभिमानी
देख दिखावे के पीछे
धाव रहे हैं देखो ज्ञानी
ये कैसे जगत में भेजा तूने
जहां हर जीव है अभिमानी ॥

दर्द पराये कहां दिखते हैं
यहां इंसां आ कर खुद बिकते हैं
वो जाने क्या होती बदनामी
जाने किस आग में दुनिया जलती है
क्यों तड़फ रही दुनिया बिन पानी
ये कैसे जगत में भेजा तूने
जहां हर जीव है अभिमानी ॥

मैं चाहूं कि तू मुझे बुला ले
हे इस जगत के रखवाले
माना हूँ मैं मूर्ख कामी
तू दाता है, तू ही दयालू
अब क्षमा भी कर दो मेरी नादानी
ये कैसे जगत में भेजा तूने
जहां हर जीव है अभिमानी ॥

सुशील कुमार पटियाल
02-11-2016 1:54 AM

मंगलवार, 25 अक्तूबर 2016

तुम जानती हो

मैं जानता हूं तुम जानती हो
मेरे दिल में क्या है
मेरी आंखो से पहचाती हो
मैं जानता हूं परिणाम है क्या
तुम भी बनी अंजान सी हो
मैं जानता हूं तुम  जानती हो ॥

तुमसे मिलने को
बातें करने को जी करता है
मगर गलती से भी गलत न हो
इस बात से दिल ये डरता है
अब तो यूं लगता है जैसे
मेरी खोई हुई पहचान सी हो
मैं जानता हूं तुम  जानती हो ॥

तुम्हारा हंसना, मुस्कराना
खोज के बहाना, तुम्हें देखना
और फिर मिलने जाना
भला ऐसा क्यों ये दिल करता है
आँखों से न ओझल होना
अब जैसे मेरी जान सी हो
मैं जानता हूं तुम  जानती हो ॥

© Copyright
सुशील कुमार पटियाल
दिनांक: अक्टूबर 25, 2016
समय: 5:29 AM



रविवार, 23 अक्तूबर 2016

वक़्त वक़्त की बात है

सब वक़्त वक़्त की बात है
कल वक़्त हमारे साथ था
आज वक़्त तुम्हारे साथ है
सब वक़्त वक़्त की बात है ॥

कभी पलते हैं खुशियों के पल
कभी गमों की रात है
कभी उदासी के पल पलते
कभी उजालों की बरसात है
सब वक़्त वक़्त की बात है ॥

कहते हैं वक़्त बड़ा बलवान है
सामने उसके किसी की क्या औकात है
आज चलो चाहे तन के कितना
पर आखिर में राख है
सब वक़्त वक़्त की बात है ॥

© Copyright
सुशील कुमार पटियाल
दिनांक : अक्टूबर 23, 2016
समय: 6: 36 AM

शनिवार, 22 अक्तूबर 2016

अच्छा लगता है

कुछ न लवों से कहना
बस उन्हें देखते रहना
अच्छा लगता है
उन लवों पे रहे मुस्कान सदा
देख उन्हें ही दिल धड़कता है॥

आंखों के समंदर में
आकाश की अठखेलियां
कहना है क्या
कह जाते हैं क्या
बुझाते है बस पहेलियां ॥

क्यों नींद नहीं हमेंआती है
क्यों जगना अच्छा लगता है
कुछ न लवों से कहना
बस उन्हें देखते रहना
अच्छा लगता है ॥

© Copyright सुशील कुमार पटियाल
तिथी- अक्टूबर 22, 2016
समय-5: 25 AM

गुरुवार, 17 सितंबर 2015

उद्देश्य क्या है जीवन का?

उद्देश्य क्या है जीवन का
आओ इसे पहचाने
ईश्वर से ही प्यार करे
और ईश्वर को ही जाने।।

जब तक तेरी जान रहेगी
इस देह से तेरी पहचान रहेगी
छोड के जब जाओगे इसको
मरा ये देखो दुनिया कहेंगी ॥

             सुशील कुमार पटियाल

शुक्रवार, 31 जुलाई 2015

इन्सान ये सोच रहा...

तेरी देह पर तेरा अधिकार नहीं
फिर करता क्यों ये विचार नहीं
दोष दूसरों के दिख जायें
पर क्यों अपनों पे ये विचार नहीं।।

हर एक इन्सान ये सोच रहा
कि बस वही महान है
मगर शायद नहीं वो जानता
कि यही सब से बडा अग्यान है ।।

घमण्ड के कारण घमासान है
जहां प्रेम वहां सब आसान है
फिर क्यों नही प्रेम अपनाते हैं
सब क्यों परायेपन से सब परेशान हैं

सुशील कुमार पटियाल

३०-०७-२०१५

गुरुवार, 30 जुलाई 2015

छोटी सी ज़िन्दगी..



ये छोटी सी ज़िन्दगी
पर कोई मिलकर न रह पाये
सब अपने - अपने रास्ते
आयें और चले जायें ।।

कर्म की बेल जो बो जायेंगे
फल उसका तो पाना है
आज भले ही सुख पा लोगे
पर एक दिन शीश झुकाना है ।।

अपने - अपने रास्ते
सबकी अपनी- अपनी सोच
अन्त घडी जब आ जाती है
तब आती है होश ।।

जीते जी रहे धुर विरोधी
आपस में रहा रोष
पर यही तो जग में होता रहा है
फिर मनवा काहे रहा तू सोच

सुशील कुमार पटियाल
१९-०७-२०१५

मंगलवार, 7 जुलाई 2015

वही सयाना है...

कुछ चले गए
कुछ ने अभी जाना है
किसी को जीवन दुश्वर लगता
कोई ढुंढता जीने का बहाना है।।

सब कुछ मान के अपना बैठे
सब साथ में ले जाना हो जैसे
थोडा और कमाऐं पैसे,
भला इस दुनिया के लोग है कैसे।।

समझा जीवन का सत कोई
समझो वही सयाना है
वरना क्या है,,,,,,,,,,,
इक देह छोड के, दूसरी पाना
फिर वापिस यहीं आना है।।

                सुशील कुमार पटियाल

चार दिन की चांदनी

चार दिन की चांदनी
फिर चारों खाने चित
फिर भी नहीं हम जानते
अपना हित और अहित।।

इन चार दिनों के चाव में
देखो चंचल मन की चाल
पल-पल का किसी को नहीं पता
अरमां वर्षों के लिए पाल ।।

चार दिनों की चमक-दमक में
नए सपने संजोए नित
नहीं पता है किसी का यारो
कि कब जाना है मिट    ।।

                              सुशील कुमार पटियाल

सोमवार, 11 मई 2015

कितनी रातें, कितने दिन

कितनी रातें, कितने दिन
बीत गये
पर फिर भी सबको लगता है
हम जीवन की जंग जीत गये
पल-पल सांसे खर्च हो रहीं
देह की हर कोई परत हो खो रही
खत्म हो रहा जीवन पल पल
पर फिर भी सबको लगता है
हम मौत से जंग जीत गये।।

             सुशील कुमार पटियाल

गुरुवार, 9 अप्रैल 2015

ईशवर से ही प्यार..

उद्देश्य कया है जीवन का

आओ इसे पहचाने
ईशवर से ही प्यार करे
और ईशवर को पहचाने
जब तक तेरी जान रहेगी
इस देह से ही पहचान रहेगी
छोड के जब जाओगे सब को
मरा ये देखो दुनिया कहेगी

                           सुशील कुमार पटियाल

शनिवार, 21 जून 2014

कब नींद भला ये टूटेगी ?


कब नींद भला ये टूटेगी?
सच को झूठ और झूठ को सच
जो बनाने लगा
वही इस जहान पे छाने लगा ।।
हमें गुलामी की लत है
ये भला कब छूटेगी
कब जनता आखिर जागेगी
कब नींद भला ये टूटेगी ।।
झूठ फल-फूल रहा है कितना
सच देखो कहराने लगा
सच को झूठ और झूठ को सच
जो बनाने लगा
वही इस जहान पे छाने लगा ।।

                           सुशील कुमार पटियाल (१९-०६-२०१४)

शुक्रवार, 7 फ़रवरी 2014

याद भुलाना न

प्रभू आगे जो भी जीवन देना
अपनी याद भुलाना न
ज़हन में नाम चले तेरा ही
मेरी यादों से कभी जाना न  ।।

जीवन सुन्दर दिया ये तूने
सो मन ये मेरा माना न
उलझ गया हूं जगत-जाल में
पर तुम तो मुझे भुलाना न ।।

मुर्ख मन की मन्त्रणा से
अब तू मुझे चलाना न
ज़हन में नाम चले तेरा ही
मेरी यादों से कभी जाना न ।।

माफ करो

प्रभू जी, मेरे चित का दर्पण साफ करो
अब तक जो भी हुई गलतियां
उन सब को माफ करो
प्रभू जी, मेरे चित का दर्पण साफ करो ।।

खुद को समझा पाक साफ मैं
पर मन में रहा विकार भरा
काम, क्रोध और लोभ-मोह का
घडा तो अब भी नहीं भरा ।।

मुझ को शरण में ले लो अपनी
अब तो न उदास करो
जीवन अब तक आम रहा
कुझ अब तो प्रभू जी खास करो

अब तक जो भी हुई गलतियां
प्रभू जी मुझ को माफ करो
धूल जमीं  है चित पे मेरे
मेरे चित का दर्पण साफ करो ।।

स्वयं समझ न पाए



कस्तूरी वन-वन भटक रही है
क्यों मंद मंद मुसकाय,
स्वयं समझ न पा रही
ये सुगंध कहां से आए ।।

यही हाल कुछ है हमारा
ईश है भीतर मेरे अपने
ढूंढ लिया ये जग सारा

देख के सुन्दरता इस जग की
आंखे फिर भी भटक रही हैं,
पल पल जीवन खत्म हो रहा
तन पे तलवार लटक रही है

सुन्दरता के मद में फूला
बल पे रहा हघाय
कोई लगते हैं अपने से
कोई लगते है पराये
दशा दुरुस्त नहीं मन की
करूं भला क्या हाय

कस्तूरी वन-वन भटक रही है
क्यों मंद मंद मुसकाय,
स्वयं समझ न पा रही
ये सुगंध कहां से आए ।।

      

सोमवार, 4 नवंबर 2013

सब के लिये

जब तक जी में जान है
कोई मुर्ख तो कोई महान है
कोई गुणवान तो कोई नादान है
कोई नि्र्धन तो कोई  धनवान है
कोई बुढा तो कोई  जवान है ।।

कहीं अल्हा तो कहीं राम है
कहीं शान्ति तो कहीं तुफान है
कहीं दीनता तो कहीं गुमान है
कहीं लूट तो कहीं लगान है ।।

कोई इन्साँ तो कोई शैतान है
कोई अन्जान तो कोई महमान है
कोई कमजोर तो बलवान है
सबसे आखिर में मगर
सब के लिये शमशान है ।।   


Written on 23-10-2013
                 सुशील कुमार पटियाल 

सोमवार, 21 अक्तूबर 2013

राख तो एक दिन होना है



ये जीवन तो जीवन भर का रोना है
इस सोने जैसी काया को तो
राख तो एक दिन होना है...
अभिमान भला फिर कैसा है
सब कुछ रहता पडा यहीं
चलता जगत ज्यूं जैसे का जैसा है ।।
कोई चोरी-बइमानी में उलझा
जीवन रह जाता अनसुलझा
यही तो कारण है इस जग में
कहीं बाढ,कहीं सूखा है;
प्रण करो ऐ देश प्रेमियों
हमें अन्त्रमन को धोना है
इस सोने जैसी काया को तो
राख तो एक दिन होना है ।।

कुछ और ही होगा



न हिन्दू न कोई मुसलमान है
जिसमें नहीं है प्यार-मुहब्बत
कुछ और ही होगा ...
मगर नहीं वो कोई इन्सान है ।।
लहू जो बहता है रगों में
अगर नहीं सुर्ख सफेद है
उसी मू्र्ख के हृदय में
रहता ऊँच-नीच का भेद है
खुद को इन्सान कहते हैं
बस इसी बात का खेद है ।।
पल दो पल का जीवन है
ये जीवन बना संग्राम है
जिसमें नहीं है प्यार-मुहब्बत
कुछ और ही होगा
मगर नहीं वो कोई इन्सान है ।।
 
                     

शनिवार, 5 अक्तूबर 2013

ज़रा जल्दी से उपचार करो

प्रभू रोको चित की चंचलता
मेरा भी उद्दार करो
कभी बुरा न निकले मुंह से मेरे
तनिक इतना हो उपकार करो ।।

दुनिया के इस जंगल में
दिखते इन्साँ मुझ को कम
अमीर, गरीब का हिस्सा खा रहा
क्यों दुनिया का दिल हो रहा तंग
प्रभू न हमको यूं लाचार करो  ।।

बिगडी हुई इस बुद्धि का
ज़रा जल्दी से उपचार करो
प्रभू रोको चित की चंचलता
मेरा भी उद्दार करो ।।


                  सुशील कुमार पटियाल

आपसी तकरार से

न तीर से न तलवार से
इन्सां तो देखो मर रहा
केवल आपसी तकरार से ।।
खुश होता है,
किसी को दुख में देख के
मिलता सुख उसे,
किसी का गला रेत के
सुख दुख बाँटना भूल गया
बात न होती, बिन हथियार से
न तीर से न तलवार से
इन्सां तो देखो मर रहा
केवल आपसी तकरार से ।।
प्रेम प्यार अब जिस्मानी हो गया
सच्चा प्रेम अब लुप्त हो गया
मेहनत से जी चुराता है
तन मन से यूँ सुस्त हो गया
कुछ न करता,
बस बैठे हो के लाचार से
न तीर से न तलवार से
इन्सां तो देखो मर रहा
केवल आपसी तकरार से ।।



        
                                   सुशील कुमार पटियाल
 

मंगलवार, 1 अक्तूबर 2013

चोर - चोर मोसेरे भाई



चोर - चोर मोसेरे भाई
बचा जो इनसे
ले गया जमाई
खत्म हो रहा देखो खज़ाना
जनता बैठी मारे जम्हाई ।।
राम रहीम पे लडाते हैं
सब मेवा मिलकर खाते है
गरीब के हिस्से में तन्हाई
चोर - चोर मोसेरे भाई
बचा जो इनसे
ले गया जमाई ।।



सुशील कुमार पटियाल

शुक्रवार, 12 जुलाई 2013

कृपया मेरा साथ दो


 हे ईश्वर - कृपया मेरा साथ दो
डूब न जाऊं मझधार में
बढा के अपना हाथ तुम
अब तो मुझे उबार लो ।।
अभिमान से कहीं मैं भर न जाऊं
दुश्मन से कहीं डर न जाऊं
काम कभी न हो मुझ से ऐसा
की खुद का आइना देख न पाऊं ।।
... छोटी सी ये जिन्दगी
पाप पुण्य का लेखा है
कोई माने या फिर न माने
पर मैंने तो ये देखा है।।
जीवन बीता अब तक जितना
सब दे दिया संसार को
हाथ रहे हैं खाली अब तक
अब प्रचूर अपना प्यार दो
और जीवन मेरा संवार दो
हे ईश्वर - कृपया मेरा साथ दो ।।

सुशील कुमार पटियाल
07-07-2013
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मंगलवार, 8 जनवरी 2013

चोरों को पकडवाने की सज़ा मुझे क्यों? चोरों के हाथों से अपना फोन छुडवाया पुलिस के हाथ में फसाया।



मेरे साथ ०३-०१-२०१३ शाम ७ बज कर ५ मिन्ट पर एक दु्र्घटना हुई। मैं शाम को डयूटी जा रहा था और रा के पुरम के गेट नम्बर ३ पे अपनी औफिस कैब का इन्तज़ार कर रहा था। उसी समय दो चोर मोटरसाइकल पर सवार आये और मेरे सामने बाइक खडी कर दी और पूछने लगे, भैय्या यहां सैक्टर ५ में एक यादव कोचिंग सेंटर है, उस का पता बता सकते... हैं। मैंने कहा, "मुझे मालूम नहीं है आगे जा के पता कर लो"। एक चोर ने पूछा कि यह गेट नम्बर ३ है? मैंने कहा हां यही गेट नम्बर ३ है।
तव एक चोर कहा भैय्या एक काल करवा देंगे हमारे फोन में बैलेंस खत्म हो गया है, मैंने कहा ठीक है नम्बर बताओ। उन्होंने यह नम्बर दिया- ९९५३४५८६२४। मैंने नम्बर मिलाया और यादव कोचिंग सेंटर के बारे में पूछा तो जबाव आया, रोन्ग नम्बर है। फिर चोर ने कहा नम्बर तो सही है, यह अंकित सर का नम्बर है। पलीज़ एक बार मुझे मिलाने दो। मैंने सीधे स्वभाव से फोन उसे दे दिया उसी टाइम आगे वाले बाइक सवार ने बाइक भगाना शुरू कर दिया। तभी मैंने लपक कर बाइक पकड ली और जोर लगा कर बाइक गिरा दी और दोनों को पकड लिया और शोर मचाया और कुछ देर में लोग इक्कठे हो गये। मैंने अपना फोन उन से छीन लिया, भीड में से किसी ने पुलिस को काल कर दिया और करीब ५-८ मिनट में पुलिस आ गई। पुलिस ने मेरा नाम पता लिखा और मुझे थाने चलने को कहा। मैंने कहा मैं औफिस जा रहा हूं और अभी नहीं जा सकता। उन्होंने कहा ठीक है सुबह ८ बजे सैक्टर -१२ के थाने आ जाना और ऐ एस आई पंकज ठाकरान या एस आई धर्मपाल से मिलना, मैंने कहा ठीक है।
मैं सुवह ८ बजे (०४-०१-२०१३) को सैक्टर -१२ के थाने पंहुचा मगर एस आई धर्मपाल जी नहीं मिले। मैंने किसी से नम्बर लिया और एस आई धर्मपाल जी को काल की। जबाव आयाः मैं घर पर हूं आप ए एस आई पंकज ठाकरान से मिलो। मैं ए एस आई पंकज ठाकरान के पास गया और तो उसने कहा, अभी मेरे पास टाइम नहीं है, बाद में आना।
मै दोपहर में सो रहा था तो एस आई धर्मपाल आए और मुझे अपनी बाइक पर सैक्टर -१२ के थाने मेरा बयान नोट करने के बहाने ले आऐ। उन्होंने कहा एक आधे घण्टे में काम हो जाएगा। FIR दर्ज की गई, उन्होंने मेरा फोन भी यह कह के अपने पास रख लिया आज शाम ये कोर्ट में दिखाना है और कल मुझे वापिस कर देंगे। मैंने उन्हे वताया कि मुझे आफिस की कैब से फोन आते हैं और फोन नहीं दे सकता, तो उन्होंने कहा की आज मैनेज कर लो कल वे खुद ही फोन वापिस कर देंगे। मैं मान गया और फोन जमा करवा दिया। एस आई धर्मपाल जी ने यह भी कहा था की वह हमें घर छोड देंगे मगर जब उनका काम हो गया तो कहा अब आप खुद से चले जाओ। मैं पैसे ले के भी नहीं आया था और फिर मुझे घर पैदल जाना पडा और परेशानी का सामना करना पडा। और उस दिन शाम को मैं फोन न होने की वजह से औफिस नहीं जा पाया।
आज ०५ -०१ - २०१३ को कोई भी मेरा फोन वापिस करने नहीं आया तो मैंने एस आई धर्मपाल जी को फोन किया कि आप मेरा फोन वापिस कर दो तो उन्होंने कहा कि फोने वापिस लेने के लिय कोर्ट में Application देनी होती हैं मैंने उन्हें कहा कि मुझे चोरों को पकडवाने के सजा क्यों मिल रही हैं, इस से तो अच्छा होता कि मैं अपना फोन ले के उन चोरों को जाने देता। एस आई धर्मपाल जी मुझे आश्वासन दिया कि वे कल आफिस आने पर फोन करेंगे और आगे देखते हैं क्या होता है। मैंने उन्हें बताया कि फोन की वजह से मैं औफिस नहीं जा पाया तो मेरी नौकरी तक जा सकती है क्योंकि मैं रात की नौकरी करता हूं और केवल फोन ही एक communication mode है.
वाह रे मेरे देश का कानून, चोरों की बजाय उन लोगों को सज़ा मिलती है जो समाज में सुधार करना चाहते हैं। अब मुझे सच में टेंशन हो गई है।


मैने कई बार एस आई धर्मपाल सिंह को काल की कि मेरा फोन वापिस दे दो। उन्होंने कहा मेरे साथ कोर्ट चलना, जब मैंने उन्हें सुवह काल की तो उन्होंने कहा मैं वयस्त हूं और तुम साकेत कोर्ट आ जाओ मैं वहीं मिलूंगा। मैंने कहा ठीक है, जब मैं घर से निकला तो मैंने उन्हें फिर काल करनी चाही कि आप कहां मिलोगे, मैंने लगातार ३ काल की मगर उन्होंने फोन नहीं उठाया। फिर मैंन वापिस आ गया क्योंकि वहां से कोई जबाव नहीं आया। अब तो मैं और परेशान हो गया था। मैंने सोचा क्यों ने किसी बडे पुलिल अधिकारी से बात की जाय तो मैंने इन्टरनेट से डी सी पी छाया और ए सी पी  Bharat Singh (साउथ) का नम्बर सर्च किया। दो बार डी सी पी छाया को 9818099047 नम्बर पर काल किया मगर उन्होंने फोन उठाया नहीं, फिर मैंने ए सी पी Bharat Singh को 9811310891 नम्बर पे काल की, पहले तो उन्होंने Wrong number बताया मगर जब मैंने कहा कि ये नम्बर मुझे police ke website से मिला तो उन्होंने मुझे ए सी पी महेन्दर सिंह (साउथ) का नम्बर दिया। जब मैंने ए सी पी महेन्दर सिंह को काल किया तो उन्होंने कहा कि आपने बहुत अच्छा काम किया है और आज ही वे मेरा मोबाइल वापिस दिलायेंगे और FIR की copy भी आज ही भिजावा देंगे। (ये बात 07-01/2013 की है)। मगर इसके बावजूद कुछ नहीं हुआ। 08-01/2013 की सुबह मैंने उन्हें फिर काल किया तो उन्होंने वताया कि वे भूल गए थे। FIR की copy मुझे 09-01/2013 शाम 7:00 बजे मिले, सिपाही सुरेन्द्र सिंह ले के आए थे।   ए सी पी महेन्दर ने कहा कि आप अभी थाने जाओ और SHO से मिलो। मैं थाने गया मगर SHO नहीं मिले। फिर मैं एस आई धर्मपाल सिंह से मिला, पहले तो उनसे थोडी वहस कि, मैंने पुछा कि आप ने मेरा फोन किस आधार लिया था, क्या आप ने चोरों को पकडा था। उन्होंने कहा तू ज्याद श्याणा बन रहा है। अगर कानूनी procedure में नहीं फसना था तो चोरों को पकडवाने के लिए काल क्यों की थी। मैंने पूछा क्या चोरों को पकडवा कर मैंने कोई गुनाह किया था। तव झिझक के उन्होंने कहा मैं ही Application लिख देता हूं, इस Application को ले कर साकेत कोर्ट जा और फोन Release करवा ले। इसी बीच मैंने ए सी पी महेन्दर सिंह को काल किया और फिर एस आई धर्मपाल सिंह से बात करवाई। बात करते ही एस आई धर्मपाल सिंह का रवैया बडा नरम हो गया।
एस आई धर्मपाल सिंह एक Application लिखी और फिर एक और कोई Letter लिखा और कहा इसे कोर्ट नम्बर 210 राम खिलाडी को दिखा देना आज ही फोन Release हो जाएगा। मैं कोर्ट गया राम खिलाडी नहीं मिले मगर माननीय न्यायधीश राजेश शर्मा को मैंने वो Application और letter दे दिया। मैं एक/डेड घण्टा वहां बैठा रहा, तब उन्होंने कहा कि कल (11-01-2013) को दो बजे आना। मैंने कहा ठीक है और वापिस आ गया। आगे देखते हैं कब तक ये फोन वापिल मिल पाता है। अभी तो केस अदालत में शुरू भी नहीं हो पाया है, ये तो मेरा अपना फोन पुलिस से वापिस लेने की कवायत है।


Ponderable points

१ -  जब मैंने चोरों को पकडवाया तो एक पुलिसवाले ने कहा आपको अभी थाने चलना पडेगा, मैंने बताया अभी मैं डयूटी जा रहा हुं और नहीं जा सकता। मुझे सुवह ८ बजे बुलाय गया। मैं time पे पंहुचा मगर मुझे वापिस भेज दिया कि दोपहर में आना जबकि मैं रात भर काम करके आया था।

२ - दोहपर १ बजे एस आई धर्मपाल आए ये कह कर साथ ले गए कि आप का बयान चाहिए फिर मैं वापिस आप को घर छोड दुंगा। मेरे पापा भी साथ चले। मगर जब उनका काम हो गया, हमें कहा गया कि आप जा सकते हैं हमें और बहुत काम है। हमारे पास पैसे नहीं थे, २ किलोमीटर पैदल चल के घर आना पडा।

३ - मुझ से मेरा मोवाइल मांगा गया, मैंने मना कर दिया क्यों कि मोवाइल की वजह से औफिस जाना होता है। मगर मुझे कहा गया कि आप को फोन कल वापिल मिल जाएगा, अभी कोर्ट में दिखाना पडेगा। मुझे अंधरे में रखा गया। आज ११ दिन हो चुके हैं मेरे पास फोन नहीं है।

४ - मुझे नहीं बताया गया की फोन वापिस लेने के लिए कोर्ट तक जाना पडेगा।
५ - FIR की copy मुझे 09/01/2013 को 7 शाम को ACP Mahender Singh की involvement के बाद मिली जबकि FIR 04/01/2013 को दर्ज हुई थी।

६ - मुझे कोर्ट अकेले भेजा गया जबकि पुलिस को साथ होना चहिए था, इसी वजह से judge ने मुझे दोवारा आने को कहा। क्या आम आदमी के समय की कोई कीमत नहीं  होती। मानसिक परेशानी अलग से उठानी पडती है।

शनिवार, 25 अगस्त 2012

वक्त बडा बलवान

 ये वक्त बडा बलवान है
हर जीव की इसे पहचान है
समझे हो कोई ग्यानी-ध्यानी
भला समझे कैसे जो नादान है
ये वक्त बडा बलवान है।। 

वक्त जो चाहे
बस वही है होता
कोई पाता सब कुछ
कोई सब कुछ खोता
वक्त ना देखे
हो कोई निर्धन
चाहे कोई धनवान है
ये वक्त बडा बलवान ।।

सब को पता है सब ने मरना
सब कहते क्या मौत से डरना
फिर भी भरा क्यों -
हम सब के दिलों में अभिमान है
ये वक्त बडा बलवान है।।
                                      
                                    सुशील कुमार पटियाल

    
 

सोमवार, 23 अप्रैल 2012

दयनीय दशा है





दयनीय दशा है भारत की
बह रही गंगा स्वार्थ की
भला-भलाई मृत पडे हैं
अर्थी उठ रही परमार्थ की
         दयनीय दशा है भारत की ।।
अपना सब को स्वार्थ दिखता है
अब लेखक खुद के खातिर लिखता है
माना पहले थी दास प्रथा
पर आज खुद देखो इन्साँ बिकता है

इन्साँ का हृदय पत्थर हुआ है
और करता बात यथार्थ की
भला-भलाई मृत पडे हैं
अर्थी उठ रही परमार्थ की
         दयनीय दशा है भारत की ।।

सुशील कुमार पटियाल

सोमवार, 22 अगस्त 2011

भारत मां की इज़्जत

जब मां की इज़्जत लुट रही हो, तो क्या उसके बच्चों को चुप-चाप तमाशा देखना चाहिये या फिर आतताइयों से मुकवला करके उनका अन्त करना चाहिये?

मेरे ख्याल तो हर कोई अपनी मां के लिए लडना चाहेगा चाहे उसकी जान ही क्यों न चली जाए।
दोस्तो आज वही दिन हमें देखने को मिल रहा है, इन भ्रष्ट नेताऒं ने हमारी भारत मां के साथ बदसलूकी की है तो हम चुप कैसे बैठ सकते है।

इन नेताओं ने तो अपना दीन, धर्म, ईमान सब कुछ बेच रखा है।। ये लोग अपनी ही मां की इज़्ज़त लूट रहे हैं इससे बडी शर्म की बात इस देश के लिए क्या हो सकती है।।

इन नेताओं को हमने चुन के भेजा की ये हमारी भारत मां इज़्ज़त मान बढायेंगे, मगर आज तश्वीर आप के सामने है।। मुझे ये सोच के ताज़्जुब होता है कि अन्ना हजारे, बाबा रामदेब जो देश कि बात करते रहे है और जिनके पीछे आज जन सैलाब उमड पडा है, ये सरकार उनके साथ ही बससलूकी कर सकती है तो इस देश में उस आम आदमी की ये सरकार क्या दशा कर सकती ये सोचते हुए भी डर लगता है।

बस यही एक कारण है कि इस देश का आम आदमी अपनी शिकायत दर्ज करवाने से भी डरता है।।

तो आखिर में, मैं यही कहता हुं -
उठो, जागो ऐ देश के पहरेदारो
नहीं तो लुट जाएगा ये यारों
अगर मां की इज़्ज़त भी नहीं बचा सकते
तो तुम्हें लानत है, इस देश के गद्धारो।।

शनिवार, 20 अगस्त 2011

कैसा देश!

ये कैसा देश हमारा है
जहां मरता गरीब बेचारा है
ठोकर मिलती है हर उसको
जिसका नहीं कोई सहारा है।।

तडफ-तडफ के मरते देखो
धनवान से निर्धन डरते देखो
यहां जान की कीमत नहीं है कोई
दिखता हर कोई हारा है।।

हर चीज़ पे बोली लगती है
पर गरीब पे गोली चलती है
नहीं मिलता कुछ भी उधारा है
ये कैसा देश हमारा है।।

टूटते रिस्ते



इन्सां - इन्सां से दूर हो रहा
अब तो घाव ये नासूर हो रहा
सजा-सजा रखे थे अरमां
अब तो हर अरमां है चूर हो रहा।।

सोमवार, 9 मई 2011

बेडियाँ

दूर गगन की छाँव में,
बँधी हैं बेडियाँ पाँव में
जहाँ नहीं कोई भी वंधन हो
बस प्रेम प्यार ही बंदन हो
चलो रे मन उस गाँव में
दूर गगन की छाँव में,
बँधी हैं बेडियाँ पाँव में ।।

सुशील कुमार पटियाल

यह कविता मेरे द्वारा जून १७, २००७ को लिखी गई थी।।

मन्दिर, मस्जिद और इन्सान

मन्दिर जाऊंगा
गुरूद्वारे जाऊंगा
मस्जिद जाऊंगा
और जाऊंगा मै चर्च
मेरा भला क्या जाऐगा
क्या होगा मेरा खर्च ।।
ईश तुम्ही मैं बसता है
न महंगा न सस्ता है
बस सीधा सादा रस्ता है
मान लो उसको चाहे जैसे
क्या पडता है भला फर्क
मेरा भला क्या जाऐगा
क्या होगा मेरा खर्च ।।


सुशील कुमार पटियाल

यह कविता मेरे द्वारा जुलाई २७, २००८ को लिखी गई थी।।

ईश तुम्हीं

ईश तुम्हीं इन्सान तुम्हीं
मानो तो भगवान तुम्हीं
ग्यान तुम्हीं अग्यान तुम्हीं
तो रब की पहचान तुम्हीं
निर्धन तुम्हीं, धनवान तुम्हीं
गुणहीन तुम्हीं, गुणवान तुम्हीं
अल्हा तुम्हीं और राम तुम्हीं
सुवह तुम्हीं और शाम तुम्हीं
ईश तुम्हीं इन्सान तुम्हीं
मानो तो भगवान तुम्हीं ।।


सुशील कुमार पटियाल

यह कविता मेरे द्वारा फरवरी १२, २००६
को लिखी गई थी।।

एक इन्सान हूँ

न हिन्दू हूँ
न मुसलमान हूं
मैं तो एक एक इन्सान हूँ
मुझ से गीता
बाइबल मुझ से
मैं ही तो कुरान हूं
मै तो एक इन्सान हूँ ।।
धर्म-कर्म के ये हथकण्डे
जीवन जीने के ये फण्डे
मैं इन सब से अन्जान हूं
मै तो एक इन्सान हूँ ।।
राम मिले, न रहिम मिले
ईश मिले, ने अल्हा
मैं इन सब का पैगाम हूं
मै तो एक इन्सान हूँ ।।
ईश्वर भीतर तेरे भी है
ईश्वर भीतर मेरे भी है
बना फिर भी नादान हूं
ईश प्रेम, मैं प्राण हूं
मैं तो एक इन्सान हूं ।।


सुशील कुमार पटियाल

यह कविता मेरे द्वारा जनवरी ०१, २००६ को लिखी गई थी।।

समानता?

कौन कहता है
सब समान हैं
कोई हिन्दू तो,
कोई मुसलमान है
कोई निर्धन तो
कोई धनवान है
कोई निर्बल तो
कोई पहलवान है
कौन कहता है
सब समान है ।।
कोई हैवान तो
कोई इन्सान है
कोई भरा है जीवन से
तो कोई हुआ बेजान है
किसी को मिलता कफन तक नहीं
तो कोई पाता शमशान है
किसी को लगती
समस्या जटिल ये
तो कोई कहता आसान है
कौन कहता है
सब समान है ।।

सुशील कुमार पटियाल

यह कविता मेरे द्वारा जनवरी ०१, २००६ को लिखी गई थी।।

शनिवार, 19 मार्च 2011

मीत मतलब के

यहाँ मीत हैं मतलब के सब सारे
मान के सबको अपना हारे
कदम फूंक-फूंक के रखना
मान ले मेरी बात तू प्यारे्
यहाँ मीत हैं मतलब के सारे ।।
सच है क्या उसको पहचान
भले बुरे का कर ले ध्यान
जो ये आँखें तुझे दिखातीं
मिथ्या हैं ये सारे नज़ारे,
यहाँ मीत हैं मतलब के सब सारे ।।
गहरा गर्त है सामने तेरे
पर तुझ को दिखता नहीं है
दिखता है जो इन आँखों से
कहता है बस वही सही है
होता अगर बस यही सही तो
क्यों फिरते यूँ मारे-मारे
यहाँ मीत हैं मतलब के सब सारे

ये कविता २९ - ०६ - २०१० को लिखी गई थी। सुशील कुमार पटियाल

मौत का मातम

मौत का मातम मनाने का
अब वक्त भला है किस को
अंधों कि ये दौड लगी है
देख लो चाहे जिस को
मौत का मातम मनाने का
अब वक्त भला है किस को

सुशील कुमार पटियाल

बुधवार, 10 फ़रवरी 2010

मिथ्या अभिमान

मौत को मात दो तो माने
मुर्दे को सांस दो तो माने
समन्दर खारा भरा पडा है
मीठा कर दो तो माने
मौत को मात दो तो माने ।।
धरती के धरातल पे
पाँव रखने की जगह नहीं
बढती हुई आबादी को,
नई धरती दिला दो तो जाने
मौत को मात दो तो माने ।।
आग का अविष्कार किया
जल से बिजली दी बना
मन ही मन देखो फूल गया
मस्तक ऊँचा लिया उठा
पर कब से जाने सूर्य खडा है
न किञ्चित भी अभिमान भरा
झूठे उठे इस मस्तक को
प्रेम सिखा दो तो जाने
मौत को मात दो तो माने ।।


सुशील कुमार 'पटियाल'
यह कविता नवम्बर ५, २००९ को ११AM पर लिखी गई थी

साथ क्या जायेगा

सोचो - साथ क्या जायेगा
मिली देह ये तन मिला,
ये भी यहीं रह जायेगा
सोचो - साथ क्या जायेगा ।।
साथ यहीं के यहीं रहेंगे
मर गया देखो, सभी कहेंगे,
चाहे कितना देह को सजाए जा
सोचो - साथ क्या जायेगा ।।
न संग जायेगा पैसा प्राणी
न बन मूर्ख तू अभिमानी,
बीजेगा जो आज यहां तू
कल फिर वापिस वही पायेगा,
सोचो - साथ क्या जायेगा ।।



सुशील कुमार पटियाल
दिनांक ०७-११-२००९ को लिखी गई यह कविता!

मेरा धर्म है मानवता

मेरा धर्म है मानवता
जो प्रेम प्यार सिखाता है,
धर्म नहीं है वह मेरा
दूरी दिलों में बढाता हैं ।।
फर्क है केवल सोच का
इसमें धर्म का क्या दोष था,
धर्म तो दिलों को मिलाता है
मेरा धर्म है मानवता,
जो बस प्रेम-प्यार सिखाता है ।।


सुशील कुमार पटियाल
दिनांक ०९-११-२००९ को लिखी गई यह कविता!

नेता की ज़ुबानी (व्यंग्य्)

साम दाम और दण्ड भेद
की नीति हम अपनाते हैं
कुर्सी से हमें प्यार बडा है व्यंग्य
न कत्ल करने से कतराते हैं
साम दाम और दण्ड भेद
की नीति हम अपनाते हैं।।
हम नेता हैं इस देश के
हम ही तो कर्णधार हैं
हम ही इन्सां हम ही देवता
सब जन अपना औज़ार हैं
खुल के खोलें वाणी अपनी
न कभी शर्माते हैं
साम दाम और दण्ड भेद
की नीति हम अपनाते हैं।।
हमसे ही तो हित देश का
दुनिया दीन लाचार है
हम जो कह दें हो जाता है
हम मुखिया, देश ये मूढ-गंवार है
दुनिया रोए या चिल्लाए
हम तो अपना राग बजाते हैं
साम दाम और दण्ड भेद
की नीति हम अपनाते हैं।।
रिश्वत की रेस (दौड) में
भागें किसी भी भेष में
अपना तो रिश्वत ही संसार है
हमें पैसे से वडा प्यार है
हम सेवा करेंगे, सेवा करेंगे
कहके, जनता को वहकाते हैं
साम, दाम और दण्ड भेद
की नीति हम अपनाते हैं।।

मोवाइल - ९२१०९८६५७५ (०४-११-२००९ को ४:४३ मिन्ट पर रचित)
सुशील कुमार पटियाल

नेता की ज़ुबानी (व्यंग्य्)

साम दाम और दण्ड भेद

की नीति हम अपनाते हैं

कुर्सी से हमें प्यार बडा है व्यंग्य

न कत्ल करने से कतराते हैं

साम दाम और दण्ड भेद

की नीति हम अपनाते हैं।।



हम नेता हैं इस देश के

हम ही तो कर्णधार हैं

हम ही इन्सां हम ही देवता

सब जन अपना औज़ार हैं

खुल के खोलें वाणी अपनी

न कभी शर्माते हैं

साम दाम और दण्ड भेद

की नीति हम अपनाते हैं।।



हमसे ही तो हित देश का

दुनिया दीन लाचार है

हम जो कह दें हो जाता है

हम मुखिया, देश ये मूढ-गंवार है

दुनिया रोए या चिल्लाए

हम तो अपना राग बजाते हैं

साम दाम और दण्ड भेद

की नीति हम अपनाते हैं।।



रिश्वत की रेस (दौड) में

भागें किसी भी भेष में

अपना तो रिश्वत ही संसार है

हमें पैसे से वडा प्यार है

हम सेवा करेंगे, सेवा करेंगे

कहके, जनता को वहकाते हैं

साम, दाम और दण्ड भेद

की नीति हम अपनाते हैं।।





सुशील कुमार पटियाल

मोवाइल - ९२१०९८६५७५ (०४-११-२००९ को ४:४३ मिन्ट पर रचित)

सोमवार, 12 अक्तूबर 2009

सवाल

मेरे मन के मानचित्र पर
अनसुलझे है कई सवाल
क्यों काला कोई,
क्यों गोरा कोई,
क्यों मुखडा किसी का दिखता लाल
मेरे मन के मानचित्र पर
अनसुलझे है कई सवाल।।
कोई धनी तो कोई निर्धन क्यों है
क्यों उल्टी पडती वक्त की चाल
क्यों मांगता फिरता सडक पे कोई
भटके जैसे कोई चीज़ हो खोई
क्यों निर्धन है बदहाल
मेरे मन के मानचित्र पर
अनसुलझे है कई सवाल।।

दिल जलते हैं!

दीप कहीं, कहीं दिल जलते हैं
खुशियां कहीं, कहीं गम पलते हैं
कोई अकेला ही बढता है,
साथ किसी के दल चलते हैं
दीप कहीं, कहीं दिल जलते हैं।।
किसी किस्मत में है बस रोना
कोई बिना बजह ही हंसते है
दर्द का कहर न ढलता देखो
जीवन पल का, ज्यों वर्षों लगते हैं ।।

गुरुवार, 25 जून 2009

ब्लू लाइन की बढती गुण्डागर्दी और डी टी सी का बढता निठल्लापन

मुझे यह जान कर बहुत खेद हुआ कि डी टी सी का घाटा दोगुना से ज्यादा हो गया है। मगर शायद इस बात पे ध्यान नहीं दिया गया कि ऐसा क्यों हो रहा है। मैं आपको बताना चाहुंगा कि ब्लू लाइन की बढती गुण्डागर्दी और डी टी सी का बढता निठल्लापन ही इसका मुख्य कारण है। अगर आप ब्लू लाइन बसों की हालत देखें तो यह तो बद से बद्दतर है ही मगर इन्होंने डी टी सी को दागी और भ्रष्ट बना दिया है। डिपो से डी टी सी बसें एकदम ठीक आ जाती हैं मगर स्टैण्ड पर पहुंचते ही कागज़ों में 'बस खराब है' लिख दिया जाता है और आधे एक घण्टे से डी टी सी बस का इन्तज़ार कर रहे लोगों को परेशानी का सामना करना पडता है। यह कोइ एक दिन की बात नहीं बल्कि आए दिन ऐसी घटनाऐं देखने को मिलती हैं। नीचे दिए गए कुछ मुख्य पवाइंटस दिल्ली की यातायात व्यवस्था पर पश्न चिन्ह लगाते हैं। पहले ब्लू लाइन से शुरू कर रहा हूं -

१ - ब्लु लाइन बसों की जर्जर स्थिति - ब्लू लाइन बसों की स्थिति दयनीय है कि उन में बैठने को दिल नहीं करता मगर मजबूरी मैं लोगों को जाना पडता है। जाने ये बसें पास कैसे हो जाती हैं।

२ - असभ्य वर्ताब - ब्लू लाइन बसों के संवाहक बस को तब तक भरते रहते हैं जब तक कि सवारी से सवारी का शरीर न मिल जाए। कई बार तो यात्रीयों को गेट पे लटका कर ले जाते हैं। इस बीच यदि कोई उन्हे टोक देता है तो वे गन्दी गन्दी गालियां देना शुरू कर देते हैं या फिर बस से तुरन्त उतर जाने को कहते हैं मगर मजबूरी में यात्री कुछ भी नहीं कर पाते। एक बस में ज्यादा से ज्यादा ५२ सीटें होती हैं मगर बस में सफर कर रहे यात्रीयों के संख्या सीटों से दोगुनी होती है। क्या प्रशासन किसी बडी दर्घटना होने का इन्तज़ार कर रहा है? पैसे देकर भी लोग गालियां सुन रहे हैं क्योंकि वे जानते हैं कि ये प्रशासन उनकी मदद करने की बजाए उल्टा उन्हें ही तंग करेगा।

वास्तव में ब्लू लाइन के कन्डक्टर जो एक बस में ६ से ७ हो सकते हैं, गुण्डे हैं जो दिल्ली में आतंक मचाने कि लिये जाने जाते हैं।

३ - रिश्वत - हलांकि ये बात जगजाहिर है कि ब्लू लाइन आपरेटरस डी टी सी के कर्मचारियों से लेकर अधिकारियों तक रिश्वत देते हैं उनका रास्ता साफ रहे और कोई डी टी सी बस उनके पीछे न चले। अगर कोई बस पीछे चलती भी है तो उस में ब्लू लाइन के एक या दो बन्दे (गुण्डे) डी टी सी बस में चढ जाते हैं और ड्राइवर हो अपने निर्देशानुसार चलाते हैं। यदि कोई यात्री इसका विरोध करता है तो उसे जान से मार देने की धमकियां दी जाती हैं। यह सब मैं इसलिए लिख रहा हूं क्योंकि ये सब में खुद भुगत चुका हूं।

४ - धूम्रपान - यूं तो सरकार ने नियम बनाया है कि पब्लिक पलेस में धूम्रपान करना अपराध है मगर ये ब्लू लाइन के बस ड्राइवर कहां मानते हैं। अगर कोई बीच में टोकता है तो उनके कोप का भाजन बनता है। स्थिति तो तब और सोचनीय हो जाती है जब पुलिस वाले अपराधी को पकडने की बजाए शिकायत करने वाले को ही फंसा देती है। आम आदमी तो पुलिस के पास जाने से भी डरता है।

ये तो बात हुई भयानक ब्लू लाइन बसों की अब चलते हैं डी टी सी की कारगुजारियों की ओरः

१ - कोई समय सारणी नहीं - पेपरों में तो डी टी सी हमेशा समय पर चलती है मगर वास्तिक्ता तो कुछ और ही है। डी टी सी बस के ड्राइवर और कण्डक्टर ही मानो बस के मालिक होते है बे जब चाहे बस रोके, जब चाहे चलाएं या फिर जब चाहें बस को खराब बता कर यात्रियों को कहीं भी उतार सकते हैं।

२ - रिश्वत का चलन - मैंने कई बार डी टी सी बस ड्राइवरों और कण्डक्टरों को ब्लू लाइन वालों से रिश्वत लेते देखा है दु्र्भाग्य से मेरे पास कैमरे वाल मोवाइल नहीं है नहीं तो मैंने विडियो बना लिया होता। एक डी टी सी ड्राइवर से बात होने पर उसने बताया की अगर वे उनके दिये पैसे नहीं लेते तो उन्हें मारने की धमकी दी जाती है और अगर वे ये बातें अपने अधिकारियों को बताते हैं तो वे ब्लू लाइन वालों से न उलझने के सलाह देते है, फिर हम क्या कर सकते है। उसने बताया जब हमारे साहब लोग ही पैसे लेते हैं तो हम क्यों नहीं ले सकते।

३ - शिकायत पुस्तिका नहीं - जब कभी कोई यात्री डी टी सी कण्डक्टर से शिकायत पुस्तिका मांगता है तो वह कहता है कि हमारे पास शिकायत पुस्तिका होती ही नहीं है।

४ - घटिया हेल्पलाइन - यदि कोई यात्री भूल से भी डी टी सी हेल्पलाइन १८०० ११ ८१८१ पर फोन कर दे तो उसे कोई सपष्ट जबाव नहीं मिलता। डी टी सी हेल्पलाइन में बैठे व्यक्ति यहां तक कहते हैं कि भइया डी टी सी का तो भगवान ही मालिक है। हम कुछ नहीं कर सकते। उनकी रूखी आवाज़ यात्रियों को और ज्यादा परेशान कर देती है।

५ - बिके हुए टिकेट का दुबारा प्रयोग - यह वो सच्चाई है जो किसी के भी रोंगटे खडे कर सकती है। टिकट बिक जाने पर डी टी सी के कण्डक्टर स्टैण्ड आने पर आगे वाले गेट पर चले जाते हैं और टिकेट चेक करने के बहाने उनसे टिकेट लेकर आगे चढने वाले यात्रियों दे दिए जाते है। यह समस्या रूट नम्बर ३९२ पर ज्यादा देखी जा सकती है।

६ - डी टी सी बसों के कमी - हलांकि अगर डिपो में देखा जाए हो कई बसें बेकार में वहां खडी मिलती हैं मगर रोड पर बहुत कम। १५ मिनट से ३० मिनट के अन्तराल पर डी टी सी बस सेवा है कई बार तो १ घण्टा भी यात्रियों को इन्तजार करना पडता है। इससे डी टी सी की इमानदारी पर तो शक होना लाज़मी है। चाहे कुछ भी हो जनता डी टी सी से एक अच्छी सेबा की उम्मीद लगाऐ बैठी है।

७ - बसों में भीड - चाहे ब्लू लाइन हो या डी टी सी सभी बसों में इतनी ज्यादा भीड होती है कि बिमार आदमी, गर्भवती स्त्रीयां, बच्चे बाली औरतें और बूढे लोगों का सफर करना दूभर हो जाता है। ४२ सीटों वाली बस में १०० के लगभग यात्री हो सकते हैं। यदि दुर्घटना होती है तो आप समझ सकते हैं कि ये कितनी भयानक हो होगी।

दिल्ली (NCR) के यातायात की जो व्यवस्था अभी है वह २०१० में होने वाले कामनवेल्थ खेलों पर असर डालेगा। नीचे कुछ ऐसे सुझाव दिये जा रहे है जिससे दिल्ली (NCR) की यातायात व्यवस्था कुछ हद तक सुधारी जा सकती हैः

१ - डी टी सी के स्टाफ को ब्लू लाइन के गुण्डों से सुरक्षा दी जानी चाहिए ताकि वे उनके दवाब में आकर गाडी न चलाऐं।
२ - बस की समय सारणी बस के बाहर गेट पर लिखी रहनी चाहिए ताकि जनता को बस के टाइमिंग का पता रहे और डी टी सी के स्टाफ गाडी समय पर ही चलाए।
३ - हर ५ से १० मिनट के अन्तराल पर डी टी सी की बस सेवा होनी चाहिए ताकी यात्रियों को कोई परेशानी न हो।
४ - डिपो से निकलने से पहले हर डी टी सी बस चेक होनी चाहिए ताकि ड्राइवर बस खराब होने का बहाना न बना सकें।
५ - भ्रष्टाचार के केस में जो कोई भी पकडा जाए, उसकी सेवाएं तत्काल प्रभाव से खत्म कर दी जानी चाहिए ताकी उन पर जो सरकारी कर्मचारी होने का भूत है उतर जाए।
६ - ब्लू लाइन बसों को जल्द से जल्द बन्द कर दिया जाना चाहिए क्यों कि डी टी सी में भ्रष्टाचार का मुख्य कारण ब्लू लाइन ही है।
७ - राजनेताओं की बसें पब्लिक ट्रांसपोर्ट के लिए प्रयोग नहीं होनी चाहिए इससे भी भ्रष्टाचार फैलता है इसमें कोई शक की गुंजाइस ही नहीं।
८ - जो भी जनशिकायत हो उसका सही ठंग से उचित (लिखित में) जबाव दिया जाना जाना चाहिए ताकि लोग सरकारी काम पर भरोसा कर सकें।

उपरोक्त दिए गए सुझावों को अगर सरकार लागू करती है हो निश्चित ही दिल्ली (NCR) में यातायात व्यवस्था सुधरेगी। अगर सरकारी बसों की सेवा सही हो जाए तो लोग पब्लिक ट्रांसपोर्ट का प्रयोग करेंगे। सरकारी बसों की सेवा सही न होने की बजह से ही दिल्ली में यातायात बढा है।

सुशील कुमार पटियाल

मंगलवार, 23 जून 2009

सरकारी तन्र्त में भ्रष्टाचार - आम आदमी लाचार

मैं देखता हूं कि हजारों लोग भ्रष्टाचार का गाना गाते रहते हैं मगर जब उसके उन्मूलन की बात आती है तो किसी कोने में दुबक के बैठ जाते हैं, जानते हैं क्यों? क्योंकि हर आम आदमी के मन में हमारे अपने सरकारी तन्र्त से भय भरा पडा है वह आम इन्सान जानता है कि अगर वह पुलिस में जाएगा तो उल्टा पुलिस ही उसे तंग करेगी और कानूनी दाव पेचों से उसे ही गुनाहगार बना देगी और असली गुनहागार आम आदमी की यह गति देखकर फुले नहीं समाता और अपराध पे अपराध करता जाता है क्योंकि वह जानता है कि कोई भी उसका कुछ नहीं बिगाड सकता। मैं अपने देशवासियों को सुचित करना चाहुंगा कि अब वो दिन दूर नहीं जब आम इन्सान चोर उचक्कों और गुण्डों का गुलाम होगा और यह सब बहुत जल्दी ही होने वाला है।

मैं पिछले तीन साल से दिल्ली में रह रहा हूं पहले किराये पर रहते थे अब सरकारी (पापा के नाम से) मिल गया है मगर मिला कैसे ये कहानी थोडी डरावनी है। यूं तो सरकारी घर तीन महीने पहले इसू हो गया था मगर अधिकारियों ने पैसे खाने के चक्कर में घर की चाबी देने में ही चार महीने गुजर गए मगर हम भी डटे रहे आखिर में तंग होकर उन्होंने चाबी दे ही दी मगर जब घर के अन्दर गए तो वहां रिपेयर के नाम पर हजारों कमियां थी। अब सोचो इस भ्रष्टाचार को कैसे कम किया जाए, क्या आम आदमी के पास इतना पैसा है कि वह दर दर ठोकर खा कर न्याय की तलाश करे जो कि धनपतियों के ही पक्ष में होता है।

आइए अब बात करते हैं दुनिया के सबसे बइमान विभाग की, जानते हैं कौन सा विभाग है - जी हां, आप ने ठीक सोचा, वह है डी टी सी जोकि ब्लूलाइन बस ऑपरेटरों के हाथों बिक चुकी है। अभी हाल ही में दिल्ली के परिवहन मन्र्ती अरविन्द कुमार ने दिल्ली परिवहन निगम का घाटा दोगुना से ज्यादा घोषित किया है मगर क्या उन्होंने ये जानने की कोशिश की कि इस के पीछे क्या राज है? शायद नहीं, क्यों कि आधी से ज्यादा ब्लू लाइन बसें ऐसे गुण्डे लोगों की चलती हैं जो हमारे नेताओं चुनाव लडने के लिए पैसे देते हैं, फिर भला ब्लू लाइन बसें दिल्ली में बन्द हो जाऐं, ऐसा कभी हो सकता है।

सोमवार, 18 मई 2009

आश न कोई

टूटे सपने आश न कोई
न नर्म है बिस्तर
सडक पे सोई
धित्तकारा सेठ ने
छुप छुप के रोई
टूटे सपने आश न कोई।।
सडक पे सोई
पुलिस ने डांटा
हाथ लगाए, मारे चांटा
गरीब का नहीं इस देश में कोई
टूटे सपने आश न कोई ।।
खाना खोजूं कूडे में मैं
क्या इसी को भारत कहते हैं
हाथी के इन पांवों तले
हम निर्धन दलते रहते हैं
जाने इस अंधियारे घर में
कब खुशियों की आए लोई
टूटे सपने आश न कोई ।।


सुशील कुमार पटियाल

मंगलवार, 12 मई 2009

पुंजीवाद के बढते कदम

पुंजीवाद के बढते कदम
आम इन्सां का घुटता दम
न आंख किसी की हो रही नम
फिर भी कहते हैं सब सम
पुंजीवाद के बढते कदम।।
धनबान धूप से डरे भला क्यों
आम इन्सां डरता है ज्यों
जाने किसका कैसा कर्म
पुंजीवाद के बढते कदम।।
नंगा नाच नचाएगा ये
पूंजीवाद कहलाएगा ये
पूंजी के लिए नहीं रही शर्म
पुंजीवाद के बढते कदम।।



सुशील कुमार पटियाल
गांव मसलाणा खुर्द, बडसर, हमीरपुर
हिमाचल प्रदेश
मो० ९२१०९८६५७५

मुर्दा हो गए

मुर्दा खाने वालों के
मन भी मुर्दा हो गए
जगते रहे वो आंखों से पर
अन्र्मन से सो गए
मुर्दा खाने वालों के
मन भी मुर्दा हो गए।।
मरता है जब इन्सां देखो
जल्दी रहती जलाने की
जीभ के स्वाद के खातिर
बस बात चाहिए बहाने की
जान तो सब को प्यारी है
तेरे सामने जाने जीव कितने रो गए
पर मु्र्दा खाने वालों के
तो मन ही मुर्दा हो गए ।।

सुशील कुमार पटियाल
गांव मसलाना खुर्द, बडसर, हमीरपुर
हिमाचल प्रदेश
मो० ९२१०९८६५७५

सोमवार, 23 मार्च 2009

दूर तलक

राही राहों में न रहना
दूर तलक तुम्हें जाना है
मूंद नहीं यूं आंखें अपनी
अभी तो जग को जगाना ।।
मंजिल तो अभी दूर बडी है
परीक्षा की तो यही घडी है
जोश जगा ले रगों में अपनी
अब नहीं चलना कोई बहाना है ।।
माना ज़माने की भीड में -
तुझको है खोने का डर
मंजिल पे नज़र टिकाए रख तू
भर के साहस हर काम तू कर
सोच तझे भी कुछ कर दिखाना है ।।

सुशील कुमार पटियाल
गाँव मसलाणा खुर्द,
डाक घर झञ्ज्याणी,
तहसील बडसर,
जिला हमीरपुर, हिमाचल प्रदेस

सोमवार, 8 दिसंबर 2008

आतंकबाद को किसने ......?

आतंकबाद को किसने पाला
किसने किया मुंह देश का काला
साधू है कोई या -
है कोई लाला
आतंकबाद को किसने पाला ।।
नेताओं की सुरक्षा चाहिए
आम इंसां का मोल नहीं
तुम मानो या मानो न
क्या इसमें नेताओं का रोल नहीं
दिखते हैं जो सीधे - सच्चे
डाका देश में उन्होंने डाला
आतंकबाद को किसने पाला ।।

सुशील कुमार पटियाल ,हमीरपुर (हिमाचल प्रदेश)

Published in Navbharat Times (Online) on December 4, 2008

मंगलवार, 16 सितंबर 2008

यह कैसी गुंडागर्दी है

यह कैसी गुंडागर्दी है ?
सबकी अपनी मनमर्जी है।

पुलिस मिली अपराधी से
नेता भी खूब कमाता है
व्यापारी लूट रहा सबको
इन तीनों ने हद कर दी है।
यह कैसी गुंडागर्दी है ?

कहीं किसी को काम नहीं
कहीं चलती डिग्री फर्ज़ी है,
हम जाएं तो भी जाएं कहा,
झूठी सबकी हमदर्दी है।
यह कैसी गुंडागर्दी है ?
यह कैसी गुंडागर्दी है ?


सुशील कुमार पटियाल
(हिमाचल प्रदेश)

बांधो ना मुझे तुम बंधन में

बांधो न मुझे तुम बंधन में,
बंधन में मैं मर जाऊंगा !
उन्मुक्त गगन का पंछी हूं,
उन्मुक्त ही रहना चाहूंगा !

मिल जाए मुझे कुछ भी चाहे ,
पर दिल को मेरे कुछ भाए ना !
मैं गीत खुशी के गाता था,
मैं गीत ये हरदम गाऊंगा !

उन्मुक्त गगन का पंछी हूं ,
उन्मुक्त ही रहना चाहूंगा !

सुशील कुमार पटियाल, हिमाचल प्रदेश

अकेलेपन की व्यथा

इस अकेलेपन की दवा है क्या,
जीवन लगता व्यर्थ गया,
खुद पर आती हमें दया,
इस अकेलेपन की दवा है क्या।

अपना यहां पर लगे कोई ना,
चलन संभल के कहीं छाले कोई ना,
दूर दीवानों का घर है
यहां तो सब है नया-नया
इस अकेलेपन की दवा है क्या।

सुशील कुमार पटियाल,
हमीरपुर, हिमाचल प्रदेश

ईंट-पत्थर के जंगल

ये बिल्डिंगों के घने जंगल,
जहां इंसान-इंसान के खून का प्यासा
कर रहे जी भर के दंगल
ये बिल्डिंगों के घने जंगल।

सब कुछ सामने दिखता फिर भी,
फिर भी अंधियारा छाया है
क्या कुदरत ने या फिर
खुद इंसान ने इसे बनाया है।

बिल्डिंगों के इस घने जंगल में
ना शेर मिलता है, चीता
यहां तो इंसान ही इंसान का
खून पी के है जीता।

सुशील कुमार पटियाल

मन

मानव मन एक पक्षी है जो उड़ता है चहुं ओर
भटक रहा है यहां-वहां एक छोर से दूजे छोर

ज्यादा पाने की इच्छा में कम भी हाथ से जाता
ज्यादा नहीं मिलता फिर भी कम से काम चलाता

मन की गति न रुकती फिर भी ज्यादा को है जी ललचाता
कट जाए चाहे सिर फिर भी बुरे कामों से जी बहलाता

ज्यादा मिल जाता फिर भी और ज्यादा पाने की जी चाहता
बुरे काम करते-करते चरम सीमा लांघ जाता

मन की मति पर चलो न यारो, मन चंचल मन चोर
भटक रहा है यहां-वहां, इक छोर से दूजे छोर

मन को स्थिर रखना जो जाने कर सकता है हर काम
काम क्रोध और लोभ, मोह से दूर रहे सुबह-शाम

मन का पलड़ा भारी हो तो दियो ज्ञान का बोझ
मन की गति रुक जाएगी करिए इसका शोध

सुशील कुमार पटियाल
हमीरपुर, हिमाचल प्रदेश

है अपनी ही सरकार !

लोगों की सरकार है भाई
देखो ध्यान लगाकर ,
चले इकट्ठे होकर हैं सब
अपने-अपने हाथ फैलाकर।

मांगे लेकर पहुंच गए अब
एम.एल.ए. के दफ्तर ,
और की फरियाद
जो करते आए हैं अक्सर।

खोलो अपने कपाट प्रभु जी
हम पड़े हैं तुम्हरे द्वारे ,
पानी , राशन और चारे की
चिंता में फिरते मारे-मारे।

नेता जी की नींद टूट गई
बोले वह बड़बड़ाकर ,
और नहीं तुम्हें काम कोई क्या
जो शोर मचाते हो यहां आकर।

जाओ बैठो बाहर बेंच पर
करते हैं हम विचार ,
पर देखो घबराना नहीं
है अपनी ही सरकार।

सुशील कुमार पटियाल
हमीरपुर , हिमाचल प्रदेश

बीते वर्ष पचास

बीते वर्ष पचास
बहुत कुछ हुआ खास
मगर वो जो गरीब हैं
अब भी लगाए बैठे हैं आस
कि शायद कोई सेठ
खोलेगा कार की खिड़की
और पूछेगा
ये तिरंगा कितने का दे रहे हो ?
इतना सुनते ही खिल जाएगा चेहरा
चलो कोई देशभक्त है !!

आज मना रहे हैं हम
58वां गणतंत्र, मगर
नहीं मिला अब तक गरीबी हटाने का मंत्र
ये कैसी दुविधा में भारत है
क्यों गड़बड़ाया है इसका सारा तंत्र !!

सुशील कुमार पटियाल
हिमाचल प्रदेश

सोमवार, 15 सितंबर 2008

जंग

जीवन की इस जंग में मानव
क्यों हु्ए तुम इतने उदास
लडना है तुम्हें हर कठिनाई से
जब तक है आखिरी स्वास ।।
मंजिल तेरी चाहे दूर भी हो पर
न होना कभी निराश
कदम पे कदम बढाए जा तू
पहुंचेगा एक दिन अपनी मंजिल के पास ।।
साथ तेरा देने को कोई नहीं है
रखना न कभी किसी की आस
जीवन तो एक जंग है प्यारे
लडना इसको रख के विस्वास ।।
मंजिल को तुम्हें पाना है
दौडो तुम इतना आज
देश का भी भला हो जिस से
ताकि, सबको हो तुम पे नाज़ ।।
अभी जिन्दगी तेरी नीरस पडी है
मंजिल पा के रसवान बनेगी
थक कर हार न जाना मानव
जीवन की न फिर चाल थमेगी ।।
जीवन की जंग में प्यारे
दुखों का है भण्डार
पागल है वो घोडा
जिस पे होना है तुझे सवार ।।
ऐ मानव इस जीवन में
हर चुनौती को तू कर स्विकार
विजय पानी है तुझ को प्यारे
ये कहे "सुशील कुमार पटियाल"

सुशील कुमार पटियाल

डर

डर - डर के जीना भी
क्या कोई जीना है
इस से तो अच्छा
ज़हर पीना है ।।

सुशील कुमार पटियाल

रिक्शे वाला

रिकशेवाला , सीधा-सादा
भोला - भाला
मन से सुन्दर, तन से काला
हाथ में हैंडल
पाँव में पैंडल
माथे पे पसीना
सच पुछो तो है यही जीना !!
कडी महनत ये करता है
तोडे न कभी किसी का ताला
धन्य है वो मैय्या, भैया
जन्मा जिस ने ये रिक्शेवाला !!


सुशील कुमार पटियाल

शांति संदेश

शांति संदेश हमें यारो जगह-जगह पहुंचाना है
चलो साथ मेरे दोस्तो कहो किस-किस ने जाना है

लड़ाई-झगड़े नित देख रहे हम चलो इन्हें हमें मिटाना है
चलो साथ मेरे दोस्तो क्योंकि शांति संदेश हमें जगह-जगह पहुंचाना है

मार-धाड़ और मारपीट, इन घटनाओं को हमें घटाना है
चलो साथ मेरे दोस्तो, भूले को रास्ता दिखाना है

कोई शराबी गिरता संभलता, आया नया जमाना है
पड़ा रहा अंजान गली में, नहीं पता कहां ठिकाना है

आवाज उठाने को उठ जाए तो कहे दुनिया उसे दीवाना है
बिछड़ रहे दो भाइयों को फिर से हमें मिलाना है

इक दूजे के लिए मिट जाएं हम, देश को महान बनाना है
चलो साथ मेरे दोस्तो, देश का झंडा हमें उठाना है

प्रगति पथ पर तुमको प्यारे हर दम बढ़ते जाना है
अच्छाई का साथ दे तू, बुराई को तुझे हराना है

छुपी हुई है हर शक्ति तुझमें, हर बात मरदाना है
पांव सही पथ पर हो तो तुझे नहीं शरमाना है

शराब, तंबाकू की लत छोड़ो, भविष्य बच्चों का बचाना है
छोड़ दे ये सब प्यारे तू, प्रगति में हाथ बंटाना है

सुशील तुम्हें बतलाता यारों, हैं अपने सभी नहीं कोई बेगाना है
चलो साथ मेरे दोस्तो शांति संदेश हमें जगह-जगह पहुंचाना है

माना चला अकेला है तू, नहीं अलबेला, तू अंजाना है
मुश्किलें भी तेरे सामने होंगी, पर तुझे नहीं घबराना है

बस यार मेरे तुझे निस्वार्थ भाव से कदम बढ़ाना है
चलो साथ मेरे दोस्तो शांति संदेश हमें जगह-जगह पहुंचाना है

सुशील कुमार पटियाल
हमीरपुर, हिमाचल प्रदेश

जागो ऐ नौजवाँ

झूठी शान को छोड के प्यारे
सच को गले लगा ले
सकल समाज है तेरा अपना
देश के खातिर खुद को मिटा ले ।।
आजा़दी जिन्होंने दिलाई हमको
आजा़दी जिन्होंने उपहार दे दिया
अपनी जान गँवा के
भाग न जाना ऐ नौजवाँ
कहीं अपनी जान बचा के ।।
देश की आजा़दी का इतिहास
बडा लम्बा है भाई
हो शिखर पे अपना देश
सदा खरी करो कमाई ।।
देश में हैं जो बुरी कुरितियां
उन्हें मिटाना है तुम्हें आज
जागो ऐ नौ - जवान
बनाओ नया सुखी समाज ।।
भूल न जाना उन को तुम
खुद को देश हित में लुटा दे
रह न जाना कहीं तू गुम ।।
आज देश में फैल रहा है जो ज़हर
मिटाने के लिए तू ज उस पे
टूट जा बन के क़हर
ताकि खुशी रहे गाँव देश का
खुशी रहे हर अपना शहर ।।
भ्रष्टाचार की राजनीति में
बह रही है जो नहर
मिटा दे उस को
तभी आ सकेगी खुशी की लहर ।।
देश की सुरक्षा का भार ऐ नौजवानो -
तुम पे पडा है आज,
चुक न जाए कहीं निशाना
खुशहाल बनेगा तभी समाज ।।
सपने उनके हमें हैं पूरे करने
थे चाहते जिन्हें देशभक्त,
आजा़दी जिन्होंने दिलाई हमको
बहा के अपना रक्त ।।
सुशील कुमार पटियाल

उतार - चढाव

जिन्दगी से जो तंग है
नहीं उस में कोई उमंग है
वो क्या जाने क्या है जिन्दगी
सच कहूं तो ये ज़ग है ।।
हार कर होई है बैठता
कोई बैठ कर है हारता
वो मूर्ख नादान है
जो जीवन नहीं सुधारता ।।
जीवन जंग है,
इसमें है उल्लास रे
आज जो दूर है तेरी मंजिल
होगी एक दिन तेरे पास रे ।।
भाग न इन परिस्थितियों से
क्योंकि ये ही तुम्हें सिखाती हैं
जिन्दगी क्या है - है हौंसला !
ये बार - बार बतलाती है ।।

सुशील कुमार पटियाल

भेडचाल क्यों ?

जाने भेडचाल क्यों हम चलते जाते
खुद क्यों न कोई रास्ता बनाते
यूं तो इस जग में
सब ही हैं आते - जाते
जाने खुद कोई रास्ता क्यों नहीं बनाते ।।
भीड - भाड में खो जाना
क्या यही जीवन हमारा है
अस्तित्व न अपना कहीं खो जाए
जो वास्तव में हमारा है ।।
भीड से कट कर चलने वाले
ही शायद कुछ पाते हैं,
भीड में चलने वाले यारो
भीड में ही खो जाते हैं ।।
जाने खुद क्यों न हम,
ये सोच हैं पाते
क्यों भेडचाल हम चलते जाते
क्यों नहीं कोई अस्तित्व हमारा
क्यों अकेले नहीं हम चलने पाते?
जाने क्यों हैं हम घबराते
क्यों भेडचाल हम चलते जाते ।।

सुशील कुमार पटियाल

चलो प्रिये !

चलो प्रिये उस पार चलें
उस पार जो घोर अंधेरा है
नया उजाला ले जाऐंगे
ले जाना हमें सवेरा है,,,,,,,
चलो प्रिये उस पार चलें
उस पार जो घोर अंधेरा है ।।

इस कालख से डर कैसा
जो साथ तुम्हारा मिल जाए
कुम्हलाए हुए इन पष्पों को
नवजीवन फिर से मिल जाए
छोड के जग जाना सब को
जो न तेरा न मेरा है
चलो प्रिये उस पार चलें
उस पार जो घोर अंधेरा है ।।

कहीं भटक न जाएं वहां जा के हम
मशाल प्रेम कि लिए चलेंगे
दम न निकले इस पार कहीं ये
उस पार जाके साथ मरेंगे
यहां तो जीवन में अपने
तन्हाइयों का डेरा है,
उस पार प्रिये मैं होउंगा और तुम होगी
शायद अब नहीं यहां कुछ मेरा है
चलो प्रिये उस पार चलें
उस पार जो घोर अंधेरा है ।।

सुशील कुमार पटियाल

गंगा मैय्या कहती है........

आज देश के हर गली में
हर कूचे में -
स्वार्थ की गंगा बहती है
गंगा को भी अपवित्र कर दिया
स्वयँ गंगा मैय्या कहती है ।।
देश की गंदगी का भार
गंगा मैय्या सहती है
ये मैं नहीं -
स्वयँ गंगा मैय्या कहती है ।।
पवित्र होने न जाने
कितने यहाँ पे आते हैं
स्वयँ पवित्र होते हैं पर
तट पे गंदगी फैला जाते हैं ।।
देश के हर कोने से
कई नदियां बहती हैं
ये मैं नहीं -
स्वयँ गंगा मैय्या कहती है ।।
गंदगी दूर हटाओ यारो
है यदि शुद्ध मन से जिना
अमृत जल न रहेगा फिर ये
पडेगा तुमको ज़हरये पीना ।।
जाने सब कुछ मानव फिर भी
हर तट पे गंदगी रहती है
ये मैं नहीं...........ये मैं नहीं
स्वयँ गंगा मैय्या कहती है ।।

सुशील कुमार पटियाल

काश हम भी बच्चे होते!

काश हम भी !
बच्चे होते
कितने सुन्दर
सच्चे होते
बात-बात पर हँसते
बात-बात पर रोते
काश हम भी !
बच्चे होते ।।

मन साफ
न कोई छल होता
जी भर के
लेते हम निदिया
सुन्दर सपनों में हम खोते
काश ! हम भी बच्चे होते ।।

सुशील कुमार पटियाल

मंगलवार, 2 सितंबर 2008

राजनीति के खेल

राजनीति के इस खेल में
करते एक दूजे की बुराई
जनता को उपदेश देते हैं पर,
स्वयं देश में अराज़कता फैलाई ।।
खुद को सच्चा बतलाते हैं
दुजे को कहते हैं चोर
स्वयं तोड रहे देश को
फैला रखा है अंधेरा घनघोर ।।
कुर्सी से उन्हें प्यार है
क्या जनता से लेना
हम बनाएंगे देश को कहते
वोट हमें ही देना .................।।
जनता भी है भोली - भाली
करती अपना वोट बेकार
सहज ही बातों में उनकी आते
कुर्सी पे हो जाता फिर एक भ्रष्टाचारी सवार ।।
राजनीति के इस खेल को
जनता समझ न पाती
सत्ता में ज्यों ही भ्रष्टाचारी आते
भोली जनता फिर बडी पछताती ।।
दोस्तो खोलो आंखे अपनी
समझो राजनीति की ये चाल
लूट रहे भ्रष्टाचारी सबको
हुआ देश का है बुरा हाल ।।
जाति धर्म के आधार पर
बोट बनाएं और करते व्यापार
सत्ता में आने को सबकुछ करते
ये बात बताऐ 'सुशील कुमार' ।।

सुशील कुमार पटियाल
गांव मसलाणा खुर्द
डाक घर झञ्जियाणी
तहसील बडसर, हमीरपुर
हिमाचल प्रदेश

शुक्रवार, 29 अगस्त 2008

औजा़र हैं !

मुट्ठी भर लोगों के
हाथों में संसार है
वो ही तो इंसान हैं
हम तो केवल औजा़र हैं ।।

सुशील कुमार पटियाल

बुधवार, 6 अगस्त 2008

अधिकार तुम्हारा

देश के खातिर यारो हमको
जीना है मरना है
देश का सर ऊंचा हो जिससे
वही काम तुम्हें करना है ।।
तुम्हीं से जुडा है भविष्य देश का
तुम से है हर शान
तीर हाथ में है तुम्हारे अब
खींचना है बस तुझे कमान ।।
आज का नेता तुझे नहीं बनना
बनना है नेता कल का
सच्चाई को तू छोड न प्यारे
कभी साथ न देना छल का ।।
फुटपाथ पे सोते देखे मैंने
खुद नर्म बिस्तर पे रात बिताते है
जनहित में जो पैसा आए
उससे नेता मौज उडाते हैं ।।
दोस्तो - अधिकार तुम्हें है अपना पाना
तू न इनसे कभी घबराना
नेताओं की पोल खोल के
घोटालों से नकाव हटाना ।।
हर कोई शक्ति है पास तुम्हारे
डरते हो फिर क्यों तुम प्यारे
डाकू नेताओं का भण्डा फोड
सत्ता से उन्हें बाहर निकाले ।।


सुशील कुमार पटियाल

सौंदर्य

आंखे तेरी हिरणी जैसी
झील समा जाएगी
मेरी आंखों से बहेंगे आंसू
याद तेरी जब आएगी ।।
चांद सा चेहरा
भोली सी सूरत
तेरे आगे है क्या
संगमरमर की मूरत ।।
चाल है तेरी नागिन जैसी
किसे क्या बताऊं
मैं करता तुमसे प्यार हूं
दुनियां से कैसे छुपाऊं ।।

सुशील कुमार पटियाल

मंगलवार, 5 अगस्त 2008

प्यार के खातिर

किसको किस से प्यार यहां
सबका अपना - अपना जहान है
कुछ प्यार के खातिर तरसते हैं
कुछ पैसे के लिए तरसते हैं
कहीं तो सूखा ही रहता है
कहीं बादल घनघोर बरसते हैं


सुशील कुमार पटियाल

चलो कहीं दूर ...

छोड के रिस्ते नातों को
चलो मन कहीं दूर चलें
जहां न अपना,
हो न पराया हो,
न अपना बन के कोई छले
चलो मन कहीं दूर चलें ।।
पैसे का जहां नाम न हो
प्यार की जहां शाम न हो
जहां दूर - दूर तक प्यार पले
चलो मन कहीं दूर चलें ।।
लोग जहां पे हंसते हो
न पापी वहां पे बसते हों
न निर्धन को धनवान दले
चलो मन कहीं दूर चलें ।


सुशील कुमार पटियाल

प्यार का आधार

प्यार का आधार है पैसा
पैसा है तो ठीक है सबकुछ
हो कोई चाहे कोई ऐसा वैसा
प्यार का आधार है पैसा ।।
पैसे बिन कोई प्यार करे न
बिन पैसे कोई जिए मरे न
बिन पैसे दुख हरि हरे न
पैसे वाला कभी डरे न ।।
न माता किसी को रोती है
न पिता किसी को रोता है
न पत्नि किसी को रोती है
न भ्राता किसी को रोता है
बांध के रखता है जो सबको
वो बस पैसा होता है ।।


सुशील कुमार पटियाल

मंजिल बनी वो मेरी

मन ममता में रम गया
मंजिल बनी वो मेरी
और नहीं कोई चाहत मुझको
हो दिन उजला या रात अंधेरी ।।
जाने सब कुछ मुझको भूल गया क्यों
अब न भूले सूरत तेरी
मन ममता में रम गया
मंजिल बनी वो मेरी ।।
माना जब से तुझ को अपना
जीवन लगता सुन्दर सपना
ये दुनिया लगती राख की ढेरी
धडकन बदल गई जो उसकी
जान निकल जाऐगी मेरी
मन ममता में रम गया
मंजिल बनी वो मेरी ।।



सुशील कुमार पटियाल

मान लो तुम

ममता मेरी जान लो तुम
बात मेरी अब मान लो तुम
यकीन न हो तो मुझे बताना
चाहे मेरी जान लो तुम
पर बात मेरी अब मान लो तुम ।।
धन दौलत की नहीं कामना
और न ही संसार की
ममता बिन जीना मुमकिन नहीं
मुझे ज़रूरत है तेरे प्यार की
तुम ही मेरी जिन्दगी का खिलता कुसुम
बात मेरी अब मान लो तुम ।।
वक्त बदल जाए चाहे
न प्यार कभी कम हो ये अपना
न तुम बे-वफा हो, न हम बे-वफा हों
प्यार का सुन्दर हो एक सपना
देखो बदल न जाना तुम
ममता मेरी जान हो तुम
बात मेरी अब मान लो तुम ।।

सुशील कुमार पटियाल

गुरुवार, 31 जुलाई 2008

किसे परवाह

किसे यहां किसकी परवाह
मिट जाती है पल में चाह
इस बात का तो है खुदा गवाह
किसे यहां किसकी परवाह ।।
प्यार व्यार ये दुनियादारी
पैसे पे दुनिया पागल सारी
पैसा तोडे रिस्ते सारे
करता हूँ मैं तुम्हें आगाह
किसे यहां किसकी परवाह ।।
तू न होगा -
खातिर तेरे कोई न रोगा (रोएगा)
याद नही कभी करेगा कोई
हो जाओगे जब स्वाह
किसे यहां किसकी परवाह ।।

सुशील कुमार पटियाल

वक्त कभी तो..........

वो वक्त कभी तो आएगा
आसमाँ पे छाएगा
धरती और आकाश का
फासला मिट जाएगा
वो वक्त कभी तो आएगा
माना इस ओर अंधेरा है
देखो उस ओर सवेरा है
इस ओर भी उजाला आएगा
और हमें जगाएगा -
वो वक्त कभी तो आएगा ।।
आज ये पानी सूख रहा है
मछली का दिल टूट रहा है
जो दूर घटा है बदली की
जान वही है मछली की
फिर भी है वो आश लगाए
कि ये बादल वारिष लाएगा
और जीवन उसे दे जाएगा
वो वक्त कभी तो आएगा ।।


सुशील कुमार पटियाल

थी तमन्ना

कुछ कर गुजरने की
थी तमन्ना
जो बस दिल में रह गई
कुछ नहीं कर पाए हो तुम
कानों में ये कह गई................।।
हम चुपचाप सुनते रह गए
और तमन्ना से कह गए
क्यों पानी बन के तुम बह गई
कुछ कर गुजरने की
थी तमन्ना
जो बस दिल में रह गई..............।।




सुशील कुमार पटियाल

कल न होगा

जो आज है वो
कल न होगा
न मैं ही रहूंगा
न तू ही होगा
फिर काहे शोर मचाना है
आखिर सब को जाना है
आँख खुली है, सब देख रहा है
बन्द होगी तो कुछ न होगा
न मैं ही रहूंगा
न तू ही होगा ...............।।
मौत है क्या -
एक नींद है मीठी
फिर काहे घबराना है
आखिर सब को जाना है
आज जो तेरे अपने हैं
सब खुली आँखों के सपने हैं
कल साथ न तेरे कोई होगा
न मैं ही रहूंगा
न तू ही होगा ...............।।


सुशील कुमार पटियाल

कब होंगे आजा़द हम

कब होंगे आजा़द हम
कब होंगे आवाद हम
कब मिटेंगे फासले
कब होंगे सब सम ।।
दिलों में दूरी बढती जाए
प्रेम की सांसे ढलती जाएं
पास है सब कुछ अपने फिर भी
लगता है कि है ये कम
कब होंगे आजा़द हम ।।
आजा़दी तो यह नाम की है
दुनिया सारी दाम की है
आजा़द वही है, है जिस में दम
कब होंगे आजा़द हम ।।
कहा बापू ने और कहा नेहरू ने
क्या सुभाष था कह गया
क्या सपने थे उनके प्यारे
क्या आखिर ये रह गया
भूल गए सब -
न आँख किसी की होती नम
कब होंगे आजा़द हम
कब होंगे सब सम ।।

सुशील कुमार पटियाल

काश ऐसा होता !

काश ! कभी कुछ ऐसा होता
हँसता हर कोई, कोई न रोता
होता बडा न कोई छोटा होता
काश ! कभी कुछ एसा होता ।।
कर्ज न होता दर्द न होता
न गर्मी आती -
न मौसम ये सर्द ही होता
चिन्ता कभी न कोई होती
निश्चिन्त होकर हर कोई सोता
काश ! कभी कुछ एसा होता ।।
तकरार न होती -
बस प्यार ही होता
प्यार न होता, संसार न होता
प्यार बिना बेकार सब होता
प्यार ही प्यार जहाँ में होता
हँसता हर कोई - कोई न रोता
काश ! कभी कुछ एसा होता ।।

सुशील कुमार पटियाल

बुधवार, 30 जुलाई 2008

एक बहाना

आऒ ढूंढें एक बहाना
दर्द भरा है जीवन माना
सीखो यारो दर्द भुलाना
सुख - दुख तो है आना जाना
आऒ ढूंढें एक बहाना ।।
साथ रहेगा तेरे ज़माना
जो दर्द में भी मुस्कराऒगे
जिस आँक से देखोगे
जीवन वैसा पाऒगे
बनना पडेगा तुझे दिवाना
आऒ ढूंढें एक बहाना ।।
जो दर्द भुलाना सीखोगे
तो मन को अपने जीतोगे
खोजोगे खुशियों का ख़जाना
दर्द भरा है जीवन माना
आऒ ढूंढें एक बहाना ।।

सुशील कुमार पटियाल

खुला सा आसमान हो

वो खुला सा आसमान हो
न कहीं कोई अंजान हो
न इंसान के दाम हों
न नफरत की शाम हो
न मदिरा का ज़ाम हो
न मुल्ला, न राम हो
बस प्यार का पैगाम हो
वो खुला सा आसमान हो।।
न भूखा कोई हो
न नंगा हो
सब का अपना धंधा हो
न हाथ में किसी के डंडा हो
बस प्यार ही जीने का फंडा हो
न अपना कोई अंजान हो
बस प्यार का पैगाम हो
वो खुला सा आसमान हो ।।

सुशील कुमार पटियाल

ये तंग-तंग जहान है

वो खुला-खुला सा आसमान
ये तंग-तंग जहान है
वहाँ प्यार का फरमान था
यहाँ अपना भी अंजान है
वो खुला-खुला सा आसमान
ये तंग-तंग जहान है ।।
इंसान नहीं इंसान यहाँ
हैवानियत का रूप है
तन से सुंदर दिखते हैं पर
मन से बडे कुरूप हैं
उम़्र तो यारो ढलती है
यहाँ चाह बनने की नौजवान है
वो खुला-खुला सा आसमान
ये तंग-तंग जहान है ।।

सुशील कुमार पटियाल

काश़ हम भी बच्चे होते

काश हम भी बच्चे होते
कितने सुंदर, सच्चे होते
बात-बात पे हँसते
बात-बात पे रोते
काश हम भी बच्चे होते।।
मन साफ-
न कोई छल होता
जी भर के लेते हम निंदिया
सुंदर सपनों में हम खोते
काश हम भी बच्चे होते।।

सुशील कुमार पटियाल

गुलाम

हम कल भी गुलाम थे
आज भी गुलाम हैं
ना कल ही खास थे
ना आज ही आम हैं।।

सुशील कुमार पटियाल

इंसान यहाँ पर बिकते हैं

इंसान यहाँ पर बिकते हैं
कुछ होते पैदा, कुछ मिटते हैं
कुछ करते हैं हवा से बातें
कुछ पाँव यहाँ पे घिसते हैं
ये इंसानो की धरती है
इंसान यहाँ पर बिकते हैं।।

सुशील कुमार पटियाल

पक्की यारी

बेरोजगारी से पक्की यारी
नौकरी ढूंढे दुनिया सारी
जूते घिस गए
मिला कुछ नहीं
देखने लायक दशा हमारी
बेरोजगारी से पक्की यारी ।।
नौकरी होती, छोकरी होती
पैसा होता -
न जीवन अपना ऐसा होता
न भटकते बनके यूं भिखारी
नौकरी ढूंढे दुनिया सारी
बेरोजगारी से पक्की यारी ।।
जाएं कहां हम किसके पीछे
दबे पडे हैं कर्ज के नीचे
रंगत खोती इस बगिया को
सींचे कैसे हम बिन पानी
बने हुए हैं कैदी जैसे -
तोडे कैसे ये चार दिवारी
बेरोजगारी से पक्की यारी ।।


सुशील कुमार पटियाल

पहचान

मेरा अस्तित्व
मेरी पहचान
वही दो आँखें
वही दो कान ।।
सुशील कुमार पटियाल

मानव की गाडी

मानव की गाडी
जीवन पथ पर दौड रही है
कुचल रही जो सामने आए
पिछड गया उसे छोड रही है
रिस्ते नाते अब किसको भाते
सब जंजीरें तोड रही है
मानव की गाडी
जीवन पथ पर दौड रही है ।।
झूठ - फरेब का फूले धन्धा
सच्चे का भई धन्धा मन्दा
आँख भी है पर फिर भी अन्धा
अन्यायी घुमते हैं खुलेआम
सच्चे के लिए फाँसी का फंदा
अब तो कुछ बतलाओ यारो
क्या गलत और क्या सही है
जो सामने है -
क्या सच नहीं है ?
मानव की गाडी
जीवन पथ पर दौड रही है ।।
मानव - मित्र - भाईचारा
पैसे ने सब कुछ विसारा
धूँवा - रोली मची हुई है
शर्मो - हया कहाँ मची हुई है
कैसा ये खुशियों का पिटारा
जो कुछ है अजी पास हमारे
सब से नाता तोड रही है
मानव की गाडी
जीवन पथ पर दौड रही है ।।

सुशील कुमार पटियाल

महिला बिना

महिला माँ है
महिला छाँव है
महिला बिना
अधुरा संसार
महिला बिना है
मृत नर भी
महिला बिना है
सूना घर भी
न महिला का
करो व्यापार
महिला बिना
अधुरा संसार ।।
भ्रूण बेटी को
मारा किस ने
कैसी मानव की
वो किस्में
अरे निशीचर
बंद करो ये अत्याचार
महिला बिना
अधुरा संसार ।।
महिला अब तुझे
उठना होगा
इस दैत्य को
आगे तेरे झुकना होगा
हैं तेरे भी कुछ
मौलिक अधिकार
नहीं रही अब
तु लाचार
महिला बिना
अधुरा संसार ।।



गाँव मसलाणा खु्र्द,
डाक घर झञ्जियाणी
तहसील बडसर, जिला हमीरपुर
हिमाचल प्रदेश
पिन - १७४३०५
मोबाइल - ०९९९०१७२५१४

मंगलवार, 29 जुलाई 2008

रुप बेचने मैं चली

रुप बेचने मैं चली
छोटे कपडे डाल के
सोचती हूं सब दर्शन कर लें
जो पहने हैं बो भी उतार दे ।।
मैं हूं पुजारन पैसे की
न जिस्म बेचती ऐसे ही
चाहे मुझ को नंगा कर दो
मिल जाएं पैसे जैसे ही ।।


सुशील कुमार पटियाल

दिशा

होता न जो यार मेरा
मुझ को दिशा दिखाता कौन?
आँख मूंदे खोया रास्ता
बिना उसके पुकार लगाता कौन ?
भटका था जो ये मन मेरा
उसे राह पे लाता कौन
खुद ही समझ न पा रहा
यार बिना समझाता कौन !
अपनी धुन में मगन हुआ था
घूम रहा था बनकर डॉन
होता न यदि यार मेरा
सही राह दिखलाता कौन ?
अंधियारा दिल में भरा हुआ था
चुपचाप पडा था मैं भी मौन,
यार है मेरा लाखों में एक
बिन उसके उजियारा दिखलाता कौन ?
खुली नीं में सोया था
झूठे सपनों की थी पौन,
अगर न होता यार मेरा तो
सच का एहसास कराता कौन ?
यार हो सबका एसा यारो
यारी में नहीं होती कौम
भटके हुए इस मेरे मन को
दिशा आज दिखलाता कौन ।।

सुशील कुमार पटियाल